तुम अपने किरदार को इतना बुलंद करो कि दूसरे भाषा के विशेषज्ञ पढ़कर कहें कि ये कलम का छोटा सिपाही ऐसा है तो भीष्म साहनी, प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', हरिवंश राय बच्चन, फणीश्वर नाथ रेणु आदि कैसे रहे होंगे... गगन बेच देंगे,पवन बेच देंगे,चमन बेच देंगे,सुमन बेच देंगे.कलम के सच्चे सिपाही अगर सो गए तो वतन के मसीहा वतन बेच देंगे.

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Why are baying for blood as his own


अपने ही खून के प्यासे
मेरठ से ख़बर मिली  कि वहां माल रोड पर एक आदमी ने अपने दोस्त के साथ मिलकर अपने दो मासूम बेटांे और पत्नी को काट डाला। अपने ही बच्चो का गले रेतते हुए इस ज़ालिम बाप को ज़रा भी तरस नहीं आया। पुलिस ने इस दर्दनाक हत्याकांड मंे बिना जांच के ही अवैध सम्बंधों का दावा कर केस की गंभीरता को कम करने का प्रयास किया।
अभी इस ख़बर की स्याही सूखी भी नहीं थी कि उरई से समाचार आया कि विदवा गांव में एक भाई ने अपने सगे भाई को कुल्हाड़ी से काट डाला। बताया जाता है यहंा दोनों भाइयों केे बीच प्रोपर्टी को लेकर विवाद चल रहा था। एक भाई ने जब दूसरे से सम्पत्ति बंटवारे पर ज़ोर दिया तो वह आपा खो बैठा और गुस्से में पागल होकर पास पड़ी कुल्हाड़ी से सगे भाई के खून से हाथ रंग लिये।
तीसरी ख़बर रामपुर के मिलक से आई है जिसमें तीन भतीजों ने मिलकर अपने चाचा को मौत के घाट उतार दिया। बताया जाता है कि काफी समय से परिवार के बीच शादी में न बुलाने को लेकर आपसी विवाद चल रहा था। एक भतीजा चाचा को मनाने गया तो नशे में देखकर चाचा ने उसको उल्टे पांव भगा दिया। विडंबना यह रही कि जो भतीजा मामले को निबटाने की नीयत से गया था वही खून ख़राबे की वजह बन गया।
हालांकि ये तीनों मामले यूपी के हैं और ऐसे अनेक मामले रोज़ ही हो रहे हैं लेकिन सब पुलिस और मीडिया तक नहीं पहंुचने से पूरे देश के आंकड़े इतने भयावह नहीं दिखाई पड़ते जितने कि खून के रिश्ते आज खून के प्यासे हो गये हैं। पति पत्नी के रिश्ते को हालांकि खून का नहीं माना जाता लेकिन जीवनभर साथ मरने साथ जीने की कसम खाने से यह रिश्ता भी खून के रिश्ते से कम अहम नहीं होता। फिर भी जब कोई पति अपनी पत्नी को मौत की नींद सुलाता है तो अकसर पुरूष प्रधान समाज मृतका के बारे में बिना जांच पड़ताल और ठोस सबूत के यह चर्चा शुरू कर देता है कि हत्या आरोपी की पत्नी के ज़रूर किसी पराये पुरूष से अवैध सम्बंध रहे होंगे। जिस तरह से बलात्कार के मामलों में अकसर मर्द औरतों की बोल्ड पौशाक को लेकर उत्तेजित करने का झूठा और घटिया आरोप उल्टे बलात्कार पीड़ित युवती या महिला पर ही लगाते हैं वैसे ही इन हत्याओं के मामलों में भी किया जाता है। अजीब बात यह है कि यहां पुलिस इस बहाने को मानने के लिये पहले से ही तैयार बैठी रहती है। पुलिस को इस तरह की कार्यशैली से एक तात्कालिक लाभ यह होता है कि जहां कानून व्यवस्था पर उठने वाली उंगली थम जाती है, वहीं पुलिस को यह कहने का बहाना मिल जाता है कि इस मामले में कानून एडवांस में क्या कर सकता है?
दरअसल पूंजीवाद और समाजवाद का अंतर धीरे धीरे हमारे सामने आने लगा है लेकिन दौलत और शौहरत के पुजारी मुट्ठीभर लोग इस सच्चाई को लगातार झुठलाने का प्रयास कर रहे हैं कि पैसा कमाने की होड़ समाज से रिश्ते नातों, धर्म, मर्यादा और नैतिकता को पूरी तरह ख़त्म करती जा रही है। पूंजीवाद के सबसे बड़े वैश्विक गढ़ अमेरिका की हालत दिन ब दिन पतली और समाजवाद के आज भी मज़बूत किले चीन की हालत लगातार मज़बूत होने से भी हमारी आंखे नहीं खुल रही हैं। सच यह है कि आज हम इतने स्वार्थी और एकांतवादी होते जा रहे हैं कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अपनी मनमानी करने के लिये हम रिश्तों नातों को कच्चे धागों की तरह तोड़ने में एक पल भी नहीं लगाते। अगर थोड़ा झगड़ा और रूठना मनाना होकर ये सम्बंध फिर से प्यार मुहब्बत की डोर में बंध जायें तो फिर भी आपसी तालमेल और साझा जीवन का एक रास्ता निकल सकता था लेकिन आज तो हालत यह हो गयी है कि साझा परिवार टूटते जा रहे हैं। कुछ लोग तो शादी से पहले ही लड़के के परिवार के सामने यह शर्त रख देते हैं कि उनकी लड़की शादी के बाद अलग रहना पसंद करेगी। वे यह कहते हुए ज़रा भी संकोच नहीं करते कि वे जिस परिवार से अपना रिश्ता जोड़ने जा रहे हैं उसको तोड़ने का प्रयास विवाह होने से पहले ही कर रहे हैं। कई परिवार तो इस शर्त को पहली बार में ही ठुकरा देते हैं लेकिन अधिकांश परिवार दहेज़ के लालच या किसी बड़े और प्रभावशाली खानदान से जुड़ने के मोह में यह नाजायज़ मांग स्वीकार कर लेते हैं।
अकसर यह भी देखने मंे भी आता है कि शादी के समय अगर यह शर्त न भी रखी जाये कि वधु अलग रहना चाहेगी तो यह पहले से ही मन बना होता है कि लड़की जब लड़के को अपनी मुट्ठी में कर लेगी तो यह कौनसा मुश्किल काम है कि लड़के को उसके परिवार से लेकर लड़की किसी कीमत पर भी अलग होने का अभियान शुरू कर दे। यहीं से अलगाव के बीज बो दिये जाते हैं। यह अजीब बात है कि लगभग सभी मांबाप अपनी लड़की को को यह समझाकर ससुराल भेजते हैं कि शादी के बाद अपने पति को अपने हिसाब से चलाने की पूरी कोशिश करना और मौका देखते ही अलग हो जाना जिससे सास ससुर और ननद, भावज, जेठ, जेठानी और देवर देवरानी की सेवा और ज़िम्मेदारी से बचा जा सके जबकि अपने घर आने वाली लड़के की बहू से सौ प्रतिशत यह आशा करते हैं कि वह अपने मायके को भूलकर लड़के के पूरे परिवार के हिसाब से चले। अगर अपने घर आई बहू लड़के को अलग करने के बारे में धेाखे से भी ज़बान खोले तो पूरी ससुराल उसके पीछे हाथ धेकर पड़ जाती है, जैसे उसने कोई बहुत बड़ा पाप कर दिया हो, लेकिन यही काम जब बाकायदा दूसरे घर जाकर उनकी कन्या करती है तो इस मुहिम को न केवल वध्ु पक्ष का पूरा समर्थन और आशीर्वाद होता है बल्कि उनके विचार और तर्क भी इस चाहत के पक्ष में हो जाते हैं। ये दो पैमाने ही आज खून के रिश्तों का खून होने के पीछे मौजूद हैं। जो भाई शादी से पहले अपने छोटे भाई को लक्ष्मण और बड़े भाई को राम का दर्जा देता है वही शादी के बाद उसके खून का प्यासा हो जाता है। ज़मीन जायदाद के बंटवारे की बात चल निकलती है और जब इसमें आनाकानी और मांबाप की तरफ से पक्षपात होता है तो फिर साज़िशें और नफ़रतें पनपने लगती हैं। जिन माता पिता के लिये उनका बेटा कभी आंख तारा हुआ करता था उनके लिये वह बोझ और मुसीबत बन जाता है। बात बढ़ते बढ़ते यहां तक जा पहंुचती है कि अपना हिस्सा अपनी मांग के हिसाब से न मिलने पर दोनों भाई न केवल लड़ने लगते हैं बल्कि एक दिन गाली गलौच और मारपीट के बाद मामला थाने तहसील पहुंच जाता है। यही हाल माता पिता में से अधिकांश मामलों में पिता के साथ होता है। अदालत में मुकद्मा शुरू होने के बाद बोलचाल तक बंद हो जाती है। उसके बाद दोनो पक्ष आपस में एक दूसरे से रंजिश रखने लगते हैं। यह पता ही नहीं चलता कि कब खून के रिश्ते एक दूसरे के खून के प्यासे हो गये। हर किसी को यह लगता है कि दूसरा उसको समझता ही नहीं । साथ साथ यह भी दुहायी दी जाती है कि उसकी ज़रूरत और भावनाओं का ख़याल नहीं रखा जा रहा है जबकि यह शिकायत करते समय वह खुद यह भूल जाता है कि उसने दूसरों की परवाह की है या वह खुद भी ‘मैं, मेरा और मेरा परिवार’ के एक सूत्रीय कार्यव्रफम पर चल रहा है। इसके बाद यह दरार यहीं ख़त्म नहीं होती बल्कि इस संकीर्णता और स्वार्थ का भी विस्तार होता है। दर्जन दो दर्जन से चार पांच लोगों की छोटी यूनिट में आध्ुनिक प्रगतिशील माता पिता के बोल्ड सोच के बच्चे चाहते हैं कि उनका अपना निजी कमरा, फोन, टीवी और अलग कंप्यूटर हो। कमरे में अटैच टॉयलेट बाथरूम हो। उनका कौन दोस्त या सहेली कब उनसे मिलने आये उसपर घर के लोगों की न केवल नज़र न हो बल्कि इस बारे में उनसे कोई सवाल तक न करे कि कौन कहां से कब क्यों उनसे मिलने आता है?
इस मामले में बहनों का मामला और पेचीदा है जहां वे अपना हक़ सम्पत्ति में मांग लेती है वहां उनको हिस्सा तो अकसर मिलता ही नहीं साथ ही परिवार से उनका बहिष्कार और शुरू हो जाता है। भाई ही नहीं प्रायः मातापिता भी अकसर ऐसा ही करते हैं। इस चक्कर में न केवल उनसे रिश्ता नाता ख़त्म कर दिया जाता है बल्कि मामला कभी कभी जीजा जी के सर थोपकर उनकी हत्या तक कर दी जाती है। हालांकि कुछ लोग जीजा साले के रिश्ते को खून का नहीं मानते लेकिन जिस रिश्ते से बहन बंधी हो उसमें बहनोई का सम्बंध सीधे न सही अप्रत्यक्ष रूप से खून से तो जुड़ ही जाता है। स्पश्ट है कि जब रिश्ता खून से जुड़ जाता है तो भौतिक विवादों को लेकर उनका भी वैसा ही हश्र होता है जैसा वास्तविक खून के रिश्तों का होता है। इसको और गहराई से समझना चाहें तो चचेरे, तयेरे और ममेरे भाइयों का भी पैसे और प्रोपर्टी के बंटवारे को लेकर यही हाल होता है।
कहने का मतलब यह है कि जब हम पूंजीवादी व्यवस्था में जी रहे हैं तो उसकी बुराइयां और कमियां भी हमको झेलनी होगी। यह नहीं हो सकता कि हम गुड़ खायें और गुलगुलों से परहेज़ करें। शिक्षा के साथ साथ जब तक हम सही शिक्षा, समाज व नैतिकता के बारे में नहीं सोचेंगे तब तक खून के रिश्तों का खून ऐसे ही नहीं बहता रहेगा बल्कि यह वारदातें और ख़तरनाक हादसे बढ़ते ही जायेंगे। एक शायर की चार लाइनें यहां पेश हैं-
0 अजीब लोग हैं क्या खूब मुंसफी की है,
हमारे क़त्ल को कहते हैं खुदकशी की है।
इसी लहू में तुम्हारा सफीना डूबेगा,
ये क़त्ल नहीं तुमने खुदकशी की है।।

Hindi positions and plight

हिन्दी की दशा और दुर्दशा




MAMTA BANERJEE

MAMTA BANERJEE, SMILE AFTER
CHIEF MINISTER, WEST BENGAL 
ममता बनर्जी में माकपा की आवाजें

ममता बनर्जी के पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री बनने के बाद आमलोगों को लग रहा था कि राज्य सरकार की कार्यप्रणाली में कोई बदलाव आएगा। लेकिन वास्तविकता यह है कि वे लगातार उसी मार्ग पर चल रही हैं जिसे माकपा ने वाम शासन में बनाया था। प्रत्येक क्षेत्र में ममता और उनके दल के कारनामे एक ही तथ्य की पुष्टि करते हैं कि पिछले वाम शासन के रास्ते से ममता मूलतः बंधी हुई हैं। राजनीतिक दलीय उत्पीड़न, जमीन, किसान, शिक्षा, संस्कृति आदि सभी क्षेत्रों में वे अभी तक नया कुछ भी नहीं कर पायी हैं। इस बात की पुष्टि हाल ही में पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी के गठन की घोषणा से भी होती है।
पश्चिम बंग बिन्दी अकादमी से जिस तरह का अपमानजनक व्यवहार वाम सरकार ने किया था वैसा सारे देश में किसी सरकार ने नहीं किया। उल्लेखनीय बुद्धदेव भट्टाचार्य ने अपने समूचे 8 साल के मुख्यमंत्रित्वकाल में हिन्दी अकादमी का गठन ही नहीं किया था। जबकि प्रत्येक 4 साल में गठन होना चाहिए। वाम सरकार ने विगत विधानसभा चुनाव से 2 माह पहले किसी तरह अकादमी की गवर्निंग बॉडी घोषित कर दी। कम से कम ममता बनर्जी को इसबात का श्रेय जाता है कि उन्होंने चुनाव जीतने के बाद ही अकादमी गठित कर दी। लेकिन वे वाम शासन के रास्ते को छोड़ नहीं पायी हैं। विगत वाम सरकार ने हिन्दी अकादमी की गवर्निंग बॉडी में 5 ऐसे लोग रखे जो हिन्दी लिखना नहीं जानते थे, 15 ऐसे लोग रखे जो हिन्दी साक्षर-शिक्षक थे, लेकिन लेखक नहीं थे।
हाल ही में ममता बनर्जी सरकार ने पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी का गठन किया है। इसमें राज्य का एक भी बड़ा लेखक शामिल नहीं है। अकादमी में हिन्दी के अ-साहित्यिकों, भू.पू.पुलिस अफसरों और लालाओं को रखा गया है। इनमें ऐसे लोग हैं जिन्होंने सतीप्रथा और भारतीय फासिज्म का महिमामंडन किया है। ज्यादातर लोग खाकीनेकर मार्का फासिज्म के प्रचारक हैं। इन्होंने कभी भी हिन्दीभाषा और संस्कृति के लिए कुछ नहीं किया है। ज्यादातर लोगों को ठीक से हिन्दी लिखना तक नहीं आता। हां, धन कमाने और फासीवाद का प्रचार करने की कला में वे कुशल जरूर हैं। मूलतः इनलोगों का कला-साहित्य संस्कृति से कोई संबंध नहीं है।यह हिन्दी साहित्य ,जनता और लेखकों का अपमान है। ममता सरकार ने हिन्दी अकादमी को वामशासन की तरह हिन्दीसेवियों की संस्था बना दिया है।
'जनसत्ता' (कोलकाता संस्करण, 25 जुलाई 2011) के अनुसार 13 सदस्यीय कमेटी बनाई गयी है। इसमें विवेक गुप्ता (अध्यक्ष), अरूण चूडीवाल, पुष्करलाल केडिया, दिनेश बजाज, शांतिलाल जैन, सुल्तान सिंह, आरके प्रसाद,कुसुम खेमानी, राजकमल जौहरी, निर्भय मल्लिक, मंजूरानी सिंह, रूपा गुप्ता और जेके गोयल को सदस्य के रूप में रखा गया है। मजेदार बात यह है राज्य के सूचना और संस्कृति विभाग ने 29 जून 2011 को प्रेस विज्ञप्ति जारी की, लेकिन किसी भी अखबार ने इसे आज तक नहीं छापा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, जिन्हें अपनी सामान्य सी गतिविधि को टीवी को बताने में मजा आता है, उन्होंने भी इसकी मीडिया को जानकारी नहीं दी। यह खबर इतने लंबे अंतराल के बाद प्रेस में क्यों आई? क्या यह हिन्दी अकादमी के प्रति हिन्दीप्रेस का शोभनीय आचरण है? जबकि राज्य का सूचना और संस्कृति मंत्रालय स्वयं ममता बनर्जी देख रही हैं।
विगत अकादमी के गठन पर हिन्दीप्रेस ने बड़ा हंगामा किया था। लेकिन इसबार हिन्दीप्रेस ने भी यह खबर नहीं छापी। मजेदार बात यह है कि विगत अकादमी की घोषणा के बाद हिन्दी के अखबारों जैसे जागरण, प्रभातखबर, सन्मार्ग, जनसत्ता में अलेखकों को रखे जाने के खिलाफ खूब बयानबाजी छपी थी। वाम सरकार की तकरीबन सभी लेखकों ने निंदा की थी। लेकिन इसबार अकादमी का 29 जून को गठन हुआ और किसी अखबार ने 26 दिनों तक इस खबर की ओर ध्यान नहीं दिया। मैंने जब फेसबुक पर इस पर लिखा तब लोगों का इस ओर ध्यान गया और उसके बाद जनसत्ता ने खोजकर खबर बनायी। हिन्दीप्रेस की वाम सरकार के खिलाफ अति सक्रियता और ममता सरकार की एक सही खबर का प्रकाशित न होना कई सवाल खड़े करता है। असल में हिन्दी प्रेस, वाममोर्चा और ममता प्रशासन इन तीनों के लिए हिन्दी वाले वोटबैंक से ज्यादा महत्व नहीं रखते। ये लोग हिन्दीप्रेमी और हिन्दी लेखक का अंतर नहीं जानते। यह बंगला राजनीति और हिन्दी मीडिया में फैले सांस्कृतिक अज्ञान की अभिव्यक्ति है।
ममता बनर्जी सरकार ने हिन्दी अकादमी के गठन में जिस तरह हिन्दी लेखकों का अपमान किया है । सवाल उठता है क्या वे ऐसा बंगला अकादमी में कर सकती हैं ? क्या महाश्वेतादेवी के स्थान पर किसी अनपढ़ जाहिल आईपीएस अफसर या बंगला पूंजीपति को बांग्ला अकादमी का अध्यक्ष बना सकती हैं ?क्या बंगला अकादमी में बंगला लेखकों की बजाय बंगाली भाषानुरागी रखे जा सकते हैं ?
पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी का वामशासन में सबसे बुरा हाल था। विगत विधानसभा चुनाव के दो माह पहले सरकार ने गवर्निंग बॉडी बना दी। 8साल तक इसका पुनर्गठन नहीं किया। 8 सालों में कोई कार्यक्रम नहीं हुआ। अकादमी के पास ऑफिस नहीं है। निदेशक, सचिव से लेकर चपरासी तक सब पार्टटाइम हैं। अकादमी को सालाना 4 लाख रूपये के आसपास पैसा मिलता था। जिससे चपरासी, टाइपिस्ट, बिजली का बिल,फोन बिल का भुगतान होता था। ज्योति बाबू के शासनकाल से लेकर बुद्धदेव बाबू के शासनकाल तक हिन्दी अकादमी को घनघोर उपेक्षा का शिकार होना पड़ा है। राज्य सरकार ने अकादमी को कभी सामान्य संसाधन तक मुहैय्या नहीं कराए,बुनियादी सुविधाएं नहीं दीं। हम उम्मीद करते हैं नयी सरकार हिन्दी अकादमी को बुनियादी सुविधाएं और संसाधन देगी जिससे वे काम कर सकें।

इस आलेख के लेखक हैं.....जगदीश्‍वर चतुर्वेदी। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर।