तुम अपने किरदार को इतना बुलंद करो कि दूसरे भाषा के विशेषज्ञ पढ़कर कहें कि ये कलम का छोटा सिपाही ऐसा है तो भीष्म साहनी, प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', हरिवंश राय बच्चन, फणीश्वर नाथ रेणु आदि कैसे रहे होंगे... गगन बेच देंगे,पवन बेच देंगे,चमन बेच देंगे,सुमन बेच देंगे.कलम के सच्चे सिपाही अगर सो गए तो वतन के मसीहा वतन बेच देंगे.

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Today News : Chief Minister Mamata Banerjee


  • Six Congress ministers to submit resignation to Chief Minister Mamata Banerjee at 5 PM: WBPCC president Pradip Bhattacharya.

  • We will meet Governor M K Narayanan at 6 PM and inform him about withdrawal of Congress support to WB govt: Bhattacharya.

  • CBI registers two new cases in coal block allocation scam and carries out searches at seven locations.
  • Sloganeering against Prime Minister Manmohan Singh as he gets up to address International Academic Conference.
  • PM says same tactics of creating fear were adopted in 1991 but those behind it "did not succeed then, they will not succeed now".
  • We are at a point where we can reverse the slowdown in our growth: PM.

रसातल में पश्चिम बंगाल

सफल बंगाल और असफल बंगाल पश्चिम


चालीस साल पहले आजाद बांग्लादेश के जन्म के वक्त पश्चिमी जानकार संदेह से भरे हुए थे। उनकी नजर में बांग्लादेश एक ‘बास्केट केस’ था, जिसमें अपना पेट भरने की कुव्वत नहीं थी। जोन बाइज जैसे हमदर्द संगीत के जरिये अपने अमीर हमवतनों से गरीब भूखे बंगालियों के लिए पैसे और अन्य सहायता भेजने की अपील कर रहे थे।

प्रख्यात अमेरिकी जीव वैज्ञानिक गैरट हार्डिन जैसे लोग कुछ ज्यादा कठोर थे। उन्होंने लिखा कि जो लोग बच्चों पैदा करने के अलावा कुछ नहीं कर सकते, उनके लिए चावल भेजना व्यर्थ है। अपने शुरुआती एक दशक से ज्यादा वक्त तक बांग्लादेश को माल्थस के सिद्धांत का उदाहरण माना जाता था, जहां तकनीकी तरक्की और सामाजिक संगठनों का अभाव था, जनसंख्या के मुकाबले अनाज कम था और इसलिए अकाल पड़ रहे थे। जब संयुक्त राष्ट्र में उनकी जनसंख्या को लेकर भाषण झाड़े जा रहे थे, तब बांग्लादेशी राजनयिकों ने यह जवाब दिया कि ढाका या खुल्ना में पैदा हुए बच्चों के मुकाबले एक अमेरिकी बच्चा 70 गुना ज्यादा उपभोग करता है।

कुछ दिनों बाद बांग्लादेशी राजनयिकों को दूसरे कठिन सवालों के जवाब देने पड़े। बांग्लादेश में एक के बाद एक फौजी विद्रोह होने लगे और इस्लामी कट्टरपंथ भी मजबूत होने लगा। उस वक्त बांग्लादेश की आम छवि एक ऐसे देश की थी, जो जनसंख्या के बोझ से दबा जा रहा है और जिसमें फौजी तानाशाह मुल्लाओं के साथ मिलकर राज कर रहे हैं। धीरे-धीरे यह नजरिया बदलने लगा। बांग्लादेश न सिर्फ अकाल मुक्त हुआ, बल्कि चावल का उत्पादन लगातार बढ़ने लगा। उद्योग के क्षेत्र में भी अच्छी-खासी तरक्की हुई और बांग्लादेश वस्त्रों का मुख्य निर्यातक बन गया। फौजी अपनी बैरकों में लौट गए, नागरिक सरकारों ने उनकी जगह ले ली। जैसे-जैसे बंगाली इस्लाम का विवेक हावी हुआ, जेहादी भी पीछे छूट गए।

अंग्रेज नृवंशशास्त्री डेविड लुईस की एक शानदार नई किताब आई है, जिसमें उन्होंने दिखाया है कि बांग्लादेश की तबाही की जो शुरुआती भविष्यवाणियां थीं, उन्होंने बांग्लादेशी समाज की ताकत और मजबूती को अनदेखा किया। परिस्थितियों और शक्की लोगों की भविष्यवाणियों से जूझते हुए देश के किसानों, मजदूरों, उद्योगपतियों और पेशेवर लोगों ने अपने देश की एक ठीकठाक सफलता की कहानी गढ़ डाली। अब बांग्लादेश को दरिद्रता के उदाहरण के रूप में नहीं, बल्कि छोटे कर्ज जैसी खोजों के उदाहरण की तरह देखा जाने लगा। जैसा कि डेविड लुईस ने दिखाया है कि मुश्किल शुरुआत और हिंसक उतार-चढ़ावों के बावजूद बांग्लादेश 40 कठिन वर्षो से बना हुआ है और उसमें एक किस्म का लोकतंत्र भी है, तो यह बड़ी उपलब्धि है।

लुईस आगे दिखलाते हैं कि ज्यादातर आर्थिक व सामाजिक पैमानों पर बांग्लादेश की हालत पाकिस्तान से कहीं बेहतर है, जिसका वह कभी पूर्वी इलाका था। पश्चिमी पाकिस्तान के लोग पूर्वी इलाके के लोगों को नीची नजर से देखते थे और उन्हें कामचोर, आलसी मानते थे। आज पाकिस्तान सामाजिक उथल-पुथल, धार्मिक हिंसा, आर्थिक ठहराव व महिलाओं के दमन से त्रस्त है। दूसरी ओर बांग्लादेश ने आर्थिक तरक्की की है, धार्मिक कट्टरवाद को हराया है और महिलाओं की स्थिति वहां निश्चित रूप से बेहतर है।

हालांकि अब भी बांग्लादेश में कई कमियां हैं। राजनीति में वहां अब भी धार्मिक कट्टरता का साया है। हिंदू और बौद्ध अब भी इस देश में कुछ हद तक असुरक्षित हैं। फौज बैरकों से कभी भी बाहर आ सकती है, भ्रष्टाचार बहुत है और तटीय जिलों में मौसमों की मार से बचने के उपाय नहीं हैं। इन सबके बावजूद बांग्लादेश ने जो तरक्की की है, वह सचमुच प्रभावशाली है। डेविड लुईस ने उसे पाकिस्तान के मुकाबले बेहतर स्थिति में पाया है। पर मैं इस किताब के तथ्यों के आधार पर एक दूसरी तुलना करने का लालच नहीं रोक पा रहा हूं। यह तुलना भारत के पश्चिम बंगाल राज्य से होनी चाहिए। पश्चिम और पूर्वी बंगाल का पर्यावरण एक-सा है, भाषा एक ही है और दोनों का सांस्कृतिक और ऐतिहासिक आधार भी एक है।

कम से कम चार पैमानों पर बांग्लादेश पश्चिम बंगाल से बेहतर स्थिति में है। पहला, बांग्लादेश में जन-कल्याणकारी सामाजिक संस्थाओं के लिए बेहतर माहौल है। वहां ग्रामीण बैंक और जन-स्वास्थ्य केंद्र जैसी संस्थाएं गरीब ग्रामीणों और झुग्गीवासियों के बीच बहुत अच्छा काम कर रही हैं। पश्चिम बंगाल में ऐसी संस्थाएं नहीं हैं और जो हैं, उन्हें सरकार व राजनीतिक दलों के विरोध का सामना करना पड़ता है। दूसरा, बांग्लादेश में ज्यादा व्यापक और भरोसेमंद सड़कों व जलमार्गो का जाल है। सड़कों और पुलों की वजह से किसान अपने उत्पाद को बाजार में ले जा सकते हैं, बच्चों स्कूल जा पाते हैं और बीमार लोगों को दवाई मिल सकती है। बिहार में नीतीश कुमार और बांग्लादेश की सरकार ने यह पहचाना है, लेकिन पश्चिम बंगाल की सड़कें बेहद बुरी हालत में हैं।

बांग्लादेश के आधुनिक औद्योगिक उत्पादन के क्षेत्र में बड़ी तादाद में महिलाएं काम करती हैं, इसकी वजह यह है कि सरकार की आर्थिक नीति खुली और निर्यात आधारित है। पश्चिम बंगाल में आर्थिक नीतियां संकीर्ण, उद्योग और उद्योगपतियों के खिलाफ हैं।
कोलकाता में बिताए अपने दिनों के अनुभव से मैं यह कह सकता हूं कि वहां का भद्रलोक अपने पूर्वी पड़ोसी को उपेक्षा से नहीं, पर दया की भावना से जरूर देखता है। इस पूर्वाग्रह में जाति और धर्म भी शामिल है। उच्च वर्णीय बंगाली हिंदू अपने को निचली जातियों के धर्म-परिवर्तित मुस्लिमों से ऊंचा मानते हैं।

सांस्कृतिक श्रेष्ठता की यह भावना कोलकाता के एक अंतरराष्ट्रीय शहर वैज्ञानिक और कलात्मक रचनात्मकता के केंद्र माने जाने से बढ़ जाती है। यह वह शहर है, जहां रवींद्रनाथ टैगोर, जगदीश चंद्र बसु, सत्यजीत रे,अमर्त्य सेन जैसे लोग पले-बढ़े, ढाका तो उसके मुकाबले एक इलाकाई कस्बा है। कोलकाता के भद्रलोक में बंगाल के प्रति जो नजरिया है, वैसा ही नजरिया उनका बिहारियों के लिए है, जिन्हें वे रिक्शा खींचने से ज्यादा किसी और काम का नहीं समझते। लेकिन अब ऐसा वक्त आ गया है, जब उन्हें इन लोगों से कुछ सीखना चाहिए। 
पश्चिम बंगाल की समस्याएं सभी जानते हैं।

स्वास्थ्य तंत्र वहां काम नहीं करता, शिक्षा तंत्र राजनीति और निकम्मेपन का शिकार है। सड़कें अगर हैं, तो बहुत खराब हैं, निवेश आ नहीं रहा है। कर्मचारियों और मजदूरों में अनुशासन नहीं है। इन समस्याओं को हल करने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार के मंत्रियों को या तो बिहार की यात्रा करनी चाहिए या डेविड लुईस की किताब पढ़नी चाहिए। तब शायद ढाका या पटना जो आज कर रहा है, वह कोलकाता कल कर पाएगा।
(रामचन्द्र गुहा, प्रसिद्ध इतिहासकार
ये लेखक के अपने विचार हैं)

WEST BENGAL GOVERNMENT

पश्चिम बंगाल में पक्षपात का बोलबाला


ममता बनर्जी
(mamta midday -फोटो-leftgovtwb blog से साभार)
पश्चिम बंगाल की जनता ने बड़ी उम्मीदों से ममता बनर्जी का साथ दिया था और उसी उम्मीद पर सवार होकर ममता ने पश्चिम बंगाल में लेफ्ट पार्टियों का डिब्बा गोल कर दिया था। अब तो विश्व की प्रतिष्ठित पत्रिका टाइम ने भी ममता बनर्जी को सौ ताकतवर शख्सियतों में शुमार कर लिया है। जनता के विशाल बहुमत मिलने से नेताओं के बेअंदाज होने का जो खतरा होता है, ममता बनर्जी उसकी शिकार हो गई। जबसे ममता बनर्जी सत्ता में आई हैं, उनसे अपनी और अपनी नीतियों की आलोचना बर्दाश्त नहीं हो पा रही है। वह अपने और अपनी नीतियों की आलोचना करने वालों के खिलाफ लगातार कार्रवाई कर रही हैं। पहले सरकारी सहायता प्राप्त पुस्तकालयों में सिर्फ आठ अखबारों की खरीद को मंजूरी और बाकी सभी अखबारों पर पाबंदी लगाकर अखबारों को यह संदेश देने की कोशिश की गई कि सरकार के खिलाफ लिखना बंद करें। ममता बनर्जी की सरकार पर आरोप यह लगे कि उन अखबारों की सरकारी खरीद पर पाबंदी लगाई गई, जो लगातार ममता और उनकी नीतियों के खिलाफ लिख रहे थे। जब देशभर में ममता बनर्जी के इस कदम की जमकर आलोचना हुई तो चंद अखबारों को और खरीद की सूची में जोड़कर उसे संतुलित करने की कोशिश करने का दिखावा किया गया। पिछले दिनों ममता और तृणमूल कांग्रेस के नेताओं का कार्टून बनाने वाले को जेल की हवा खिलाकर ममता बनर्जी ने अपनी फासीवादी छवि और चमका ली है। मुसलमानों के प्रति झुकाव तो जगजाहिर हो चूका है।

गलत दिशा में पश्चिम बंगाल

जाधवपुर विश्वविद्यालय के विज्ञान के प्रोफेसर अंबिकेश महापात्र पर आरोप है कि उन्होंने ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के कई नेताओं के कार्टून ई-मेल पर सर्कुलेट किए। उन कार्टून में ममता बनर्जी और रेलमंत्री मुकुल रॉय के बीच दिनेश त्रिवेदी से निपटने की मंत्रणा है, जो ममता को नागवार गुजरी। प्रोफेसर महापात्र पर तमाम धाराओं के अलावा आउटरेजिंग द मॉडेस्टी ऑफ वुमेन लगा दी गई है, जिसमें साल भर की सजा का प्रावधान है। लेकिन ममता बनर्जी पुलिस की कार्रवाई को जायज ठहरा रही है। उनकी पार्टी के नेता कोलकाता पुलिस के कदम को उचित करार दे रहे हैं। विधानसभा और लोकसभा चुनावों में जीत और बार-बार केंद्र सरकार से अपनी बात मनवा लेने से ममता के हौसले सातवें आसमान पर हैं। उन्हें लगता है कि वह बहुत बड़ी नेता हो गई हैं। हो भी गई हैं, लेकिन अभी वह बड़े नेता के बड़प्पन को हासिल नहीं कर पाई हैं। उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि बड़ा नेता वह होता है, जिसमें अपनी आलोचनाओं को सुनने और सामना करने का माद्दा होता है। इस संबंध में 1939 का एक वाकया याद आता है।

गांधी जी ट्रेन यात्रा कर रहे थे, उनके साथ उनके सहयोगी महादेव देसाई भी थे। अचानक महात्मा गांधी के डिब्बे में एक युवक आया। उसके हाथ में गोविंद दास कौंसुल की किताब महात्मा गांधी: द ग्रेट रोग ऑफ इंडिया थी। वह युवक उस किताब पर गांधी जी की सम्मति लेना चाहता था। जब वह किताब लेकर गांधी की ओर बढ़ा तो महादेव देसाई ने उसके हाथ से किताब झटक ली और उसका शीर्षक देखकर वह उसे फेंकने ही वाले थे कि इतने में गांधीजी की नजर उस पर पड़ गई। उन्होंने महादेव देसाई से लेकर वह किताब देखी और उस युवक को अपने पास बुलाकर उससे उसकी इच्छा पूछी। युवक जिसका नाम रणजीत था, उसने पुस्तक लेखक का पत्र देकर गांधी जी से उस किताब पर उनकी राय पूछी। बगैर क्रोधित हुए गांधी ने किताब को उलटा-पलटा और फिर उस पर लिखा, मैंने किताब को उलटा-पुलटा और इस नतीजे पर पहुंचा कि शीर्षक से मुझे कोई आपत्ति नहीं है।

लेखक जो भी उचित समझे, उसे लिखने की छूट होनी चाहिए। ये गांधी थे, जो अपनी आलोचना से जरा भी नहीं विचलित होते थे और आलोचना करने वाले को भी अभिव्यक्ति की छूट देते थे। लेकिन गांधी के ही देश में आज एक नेता का कार्टून बनाने पर एक प्रोफेसर को जेल की हवा खानी पड़ती है। लगता है कि ममता बनर्जी कार्टून के माध्यम को दरअसल समझ नहीं पाई, उनके कदमों से ऐसा ही प्रतीत होता है। दरअसल, कार्टूनिस्ट उन्हीं राजनेताओं के कार्टून बनाते हैं, जिनकी शख्सियत में कुछ खास बात होती है। आम राजनेताओं के कार्टून कम ही बनते हैं। पूरे विश्व में कार्टून एक ऐसा माध्यम है, जिसके सहारे कभी-कभी तो पूरी व्यवस्था पर तल्ख टिप्पणी की जाती है, जो लोगों को गुदगुदाते हुए अपनी बात कहते हैं और बहुधा किसी राजनेता या समाज के अहम लोगों के क्रियाकलापों को परखते हैं। आज ममता बनर्जी जैसी नेता कार्टून जैसे माध्यम की भावना को समझे बगैर कलाकार को जेल भिजवाने जैसा काम कर रही हैं, उससे उनका कद राजनीति में छोटा ही हो रहा है। किसी प्रोफेसर को झुग्गी-झोपड़ी वालों का समर्थन करने पर जेल जाना पड़ता है।

ममता बनर्जी की पार्टी के नेता अपने विरोधियों के साथ व्यक्तिगत संबंध नहीं बनाने की वकालत करते हैं। उनकी पार्टी के सांसद खुलेआम यह ऐलान करते हैं कि संसद के सेंट्रल हॉल में वे लेफ्ट पार्टियों के नेताओं के साथ नहीं बैठ सकते। इस तरह की राजनीतिक छुआछूत का माहौल इस देश में पहले कभी नहीं बना था। यह सही है कि लेफ्ट के शासनकाल में तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं पर जमकर अत्याचार हुए। टीएमसी सांसद डेरेक ओ ब्रायन का आरोप है कि लेफ्ट के इशारे पर तृणमूल के कई कार्यकर्ताओं की हत्या भी की गई, लेकिन इन तमाम बातों को आधार बनाकर जिस तरह से ममता विरोधियों की आवाज दबाने का प्रयास किया जा रहा है, वह घोर निंदनीय है। ममता बनर्जी को याद होगा कि जब वह लेफ्ट के खिलाफ लड़ाई लड़ रही थीं तो उस वक्त बंगाल के बुद्धिजीवियों ने उनका खुलकर साथ दिया था। अब वही बुद्धिजीवी ममता के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं। पश्चिम बंगाल में अभिव्यक्ति की आजादी को बचाने के लिए सड़क पर उतरे लोगों के साथ भी पुलिस ने बदतमीजी की, लेकिन सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। अब वक्त आ गया है कि ममता बनर्जी को भारतीय राजनीति में अपनी गंभीर छवि के बारे में शिद्दत से सोचना चाहिए। वरना, उनके लिए इतिहास के अंधेरे में गुम होने का खतरा पैदा हो जाएगा। क्योंकि वह किसी पार्टी की मुख्मंत्री नहीं, बल्कि पूरे पश्चिम बंगाल की सीएम हैं। लेफ्ट को भी बंगाल ने कई बार भारी बहमनुत से जिताया था, लेकिन जब सूबे की आवाम को लगा कि जिसे वह शासन की बागडोर सौंप रही है, उस पार्टी में और उस पार्टी के नेताओं में शासन में आने के बाद तटस्थता नहीं रहती है तो उसे भी उखाड़ फेंका। लेफ्ट ने भी वोट बैंक की खातिर तसलीमा नसरीन को पश्चिम बंगाल से निकालने की गलती की थी, जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा। अब ममता भी वही गलती दोहरा रही हैं। क्या इतिहास से वह कोई सबक नहीं लेना चाहतीं!

लेखक-अनंत विजय

बंगाल की ममता सरकार विफल

मुख्यमंत्री का मुस्लिमों के प्रति बढ़ता रुझान


वामपंथी शासन से पश्चिम बंगाल को मुक्त कराने वाली ममता बनर्जी की मां-माटी-मानुष की सरकार का हनीमून शायद खत्म हो चुका है। अब वह माँ-माटी-मुसलमान तक सिमित रह गया है.  वामपंथियों के खिलाफ ममता बनर्जी को राज्य की जनता ने पिछले विधानसभा चुनावों में पलकों पर बैठाया था, और उम्मीद की थी कि सादगी का पर्याय मानी जाने वाली ममता बनर्जी बंगाल में पारदर्शिता के साथ साफ-सुथरा प्रशासन देंगी, लेकिन हाल की कुछ घटनाओं से ममता बनर्जी की सरकार पर तर्जनी उठने लगी हैं।

आम जनता का कहना है की पहले जो काम 100 रूपये देकर हो जाता था अब उसके लिए 2000 देना पड़ता है। वह भी समय से काम नहीं होता। आमरी अस्पताल कांड के बाद वैसे ही ममता दीदी से खासा नाराज़ है। इसके बाद मुस्लिमों के प्रति उनकी रुझान अगले चुनाव में मुश्किल पैदा कर सकती है। ममता दीदी से सिर्फ आम जनता ही परेशान नहीं हैं... उनके पार्टी के नेता (कुछ लोगों को छोड़कर) भी उनसे नाराज़ हैं... दिनेश त्रिवेदी के इस्तीफे मुद्दे पर ही उनसे एक धड़ा काफी नाराज़ था लेकिन जैसे-तैसे मामला शांत हो गया, लेकिन लोकसभा चुनाव से पहले अगर कुछ बदलाव हो जाये, राजनितिक उठापटक हो जाये तो कुछ नया नहीं कहा जायेगा।
केन्द्र में कांग्रेस से बात बात पर भिड़नेवाली ममता सरकार के खिलाफ विपक्षी वाममोर्चा फिर एक बार गोलबन्द हो चुका है। 19 फरवरी को कोलकाता के ब्रिगेड परेड मैदान में लाखों की भीड़ का जुटाव इस बात को और पुष्ट करता है। ब्रिगेड की सभा में माकपा महासचिव प्रकाश करात, सीताराम येचुरी सहित वाममोर्चा के राज्य सचिव विमान बोस, पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने तृणमूल-कांग्रेस की साझा सरकार की नाकामियों को बिंदास तरीके से उठाया। समझा जा सकता है कि अप्रैल में होने वाले पंचायत चुनावों के पहले वामपंथियों की 19 फरवरी की कामयाब रैली ममता बनर्जी के लिए चिन्ता का कारण बन चुकी है।

ममता बनर्जी की निजी छवि साफ-सुथरी मानी जा सकती है, लेकिन उनकी सरकार के कामकाज के तरीके पर लोगों को तसल्ली नहीं है। विधाननगर और मालदह के अस्पतालों में बच्चों की मौत पर अस्प्रपताल प्रबन्धन का बचाव ममता बनर्जी की छवि पर एक दाग की तरह है। बताना प्रासंगिक है कि यही ममता बनर्जी वाममोर्चा के शासन के दौरान ऐसी घटनाओं पर आन्दोलन किया करती थीं और सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों की लापरवाही के लिए वामपंथी सरकार को दोषी ठहराया करती थीं, लेकिन जब घटना उनके शासन में हुयी तो वे बचाव में उतरीं और चिकित्सकों की लापरवाही की बात से साफ इनकार कर दिया।

हाल में एक ईसाई महिला ने पार्क स्ट्रीट थाने में बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज करायी। इस घटना की सच्चाई को भी मुख्यमंत्री ने संदेह की निगाह से देखा और कहा कि बलात्कार की बात सही नहीं है। कोलकाता के पुलिस आयुक्त रणजीत कुमार पंचनन्दा ने कहा कि बलात्कार का आरोप प्रशासन और सरकार को बदनाम करने के लिए लगाया गया है। मजे की बात है कि मुख्यमंत्री के बयान से खिन्न होकर महिला ने एक बंगला चैनल का सहारा लिया। बंगला चैनल पर उन्होंने साफ कहा कि उनके साथ बलात्कार हुआ है। एक महिला के दर्द को मां-माटी-मानुष की सरकार की मुखिया नहीं समझ पायीं, लेकिन कोलकाता पुलिस की अपराध शाखा की संयुक्त आयुक्त दमयन्ती सेन ने समझा। उन्होंने इस घटना की कड़ी तफ्तीश की और दो ही दिन में तीन अभियुक्तों को गिरफ्तार कर लिया गया। जिस गाड़ी में महिला के साथ बलात्कार हुआ, उसे भी बरामद कर लिया गया।

ममता बनर्जी से कांग्रेस के रिश्ते लगातार तल्ख होते जा रहे हैं। राज्य मंत्रिमंडल में तृणमूल के साथ कांग्रेस के भी सदस्य शामिल हैं, लेकिन पिछले दिनों हुए पनर्गठन में कांग्रेस के मंत्री मनोज भट्टाचार्य के साथ कुछ ऐसा हुआ कि उन्हें मंत्रिमंडल छोड़ने को मजबूर होना पड़ा।

बलात्कार काण्ड में नया मोड़ आ जाने के बाद मुख्यमंत्री की किरकिरी स्वाभाविक थी। कोलकाता के मीडिया ने इस घटना को प्रमुखता से स्थान दिया। नतीजा यह हुआ कि सोमवार 20 फरवरी को मुख्यमंत्री ने राज्य सचिवालय में दमयन्ती सेन को बुलाकर बातचीत की। बाद में सरकार का बचाव करते हुए दमयन्ती सेन को मजबूरन कहना पड़ा कि इस घटना में नया मोड़ उनकी नहीं, बल्कि कोलकाता पुलिस के सम्मिलित कामयाबी है। वरिष्ट पुलिस अधिकारी का 20 फरवरी का प्रेस सम्मेलन भी स्पष्ट करता है कि राज्य सरकार बचाव की मुद्रा में है।

यही नहीं, 9 दिसम्बर को एक निजी अस्पताल में आग की घटना के बाद जिस तरह से गिरफ्तारी में भेदबाव बरता गया, उस पर औद्योगिक जगत में खिन्नता है। इस अस्पताल में आग लगने की घटना के कुछ घण्टों बाद ही अवैध शराब (चुल्लू) पीने से 175 से अधिक लोगों की मौत हुयी थी। मुख्यमंत्री ने अवैध शराब पीकर मरने वाले लोगों के परिजनों को तुरन्त दो-दो लाख के मुआवजे से नवाजा। मुख्यमंत्री के इस निणर्य भी लोग सवाल उटा रहे हैं कि अवैध शराब पीने वालों के लिए उन्होंने राजनैतिक फायदा हासिल करने के लिए मुआवजा दिया।
ममता बनर्जी के सरकार में आने के बाद उम्मीद की जा रही थी कि राज्य में आथिर्क निवेश बढ़ेगा, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। बंगाल लीड्स के नाम से राज्य सरकार की ओर से निवेशकों को आकर्षित करने के लिए कार्यक्रम किया गया था, लेकिन उसे भी अपेक्षित कामयाबी नहीं मिली। केंद्र से हजारों करोड़ के आर्थिक सहयोग को लगातार नकार रहीं ममता बनर्जी की सरकार को आने वाले दिनों में और विरोध का सामना करना पड़ सकता है।

इन परिस्थितियों में हम कह सकते हैं कि जिन ममता बनर्जी को बंगाल की जनता ने पलकों पर बैठाया था, वे मात्र 9 महीनों के शासन में ही जनता की आंखों की किरकिरी बनने लगी हैं। ममता सरकार के कामकाज के तरीकों से पुलिस और प्रशासन में भी माहौल ठीक नहीं है। कई वरिष्ट आईएएस व आईपीएस अधिकारियों ने राज्य के बाहर डेपुटेशन पर जाने की गुहार केंद्र से लगायी है। ताजा सूचना के अनुसार वरिष्ठ आईपीएस दमयन्ती सेन ने भी हाल ही में ऐसी अर्जी दी है।

India on tsunami watch after Indonesia quake

इंडोनेशिया से भारत तक कांपी धरती, सुनामी की चेतवानी

Howrah Bridge

कोलकाता, मुंबई सहित देश के कई शहरों में बुधवार को भूकंप के झटके महसूस किए गए। भूकंप का केंद्र सुमात्रा बताया जा रहा है। सुमात्रा में 8.9 की तीव्रता के भूकंप के झटके महसूस किए गए। इंडोनेशिया के सुमात्रा तट पर आए भीषण भूकंप के बाद भारत ने निकोबार द्वीपसमूह के लिए सुनामी की चेतावनी जारी कर दी है। सुमात्रा में भूकंप के बाद तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश व अंडमान निकोबार द्वीपसमूह के तटीय इलाकों को भी सतर्क कर दिया गया है।

इंडोनेशिया ज्वालामुखी और भूकंप गतिविधियों वाला देश रहा है। 26 दिसंबर 2004 को रिक्टर पैमाने पर 9.1 की तीव्रता वाले भूकंप के बाद हिंद महासागर में जबर्दस्त सुनामी आई थी, जिसमें 2,30,000 लोग मारे गए थे।


Kolkata (Rajesh Mishra) : India on Wednesday issued tsunami alert for its coastal regions, including the Andaman and Nicobar Islands, following a massive 8.7 earthquake in Indonesia. 

Strong tremors were also felt across India, including in Tamil Nadu, Karnataka, Andhra Pradesh, West Bengal and parts of Northeast India.

"We have issued a tsunami warning for Nicobar islands," Shailesh Nayak, Secretary Ministry of Earth Sciences said.


The projections issued by the Indian Tsunami Early Warning Centre (ITEWC) showed the tidal waves triggered by the quake hitting parts of Nicobar, Komatra and Katchal minutes after it struck the region at 14:08 pm (IST).

The ITEWC also issued an alert for coastal Tamil Nadu, Andhra Pradesh and the Andaman islands forecasting the arrival time of the first wave.

For Tamil Nadu, the first wave was expected to reach the coastal regions at around 4:33 pm.

A tsunami watch means there is the potential for a tsunami, not that one is imminent.

In Chennai, strong tremors were felt in different parts of the city.

People in multi-storeyed apartments and those working in high rise buildings rushed out in panic after they felt the tremors.

Police could be seen sounding an alert for tsunami on the beaches of Chennai.


Kolkata and its neighbourhood were also rocked by tremors which were also felt in North 24 Parganas adjoining Kolkata and in the north Bengal town of Siliguri.

A large number of people rushed out of offices in Park street and downtown BBD Bagh area here as windows and doors rattled.

According to reports, some buildings on Park street developed cracks.

Metro Rail services in the metropolis were suspended from 2:42 pm and passengers were asked to vacate stations.

The quake in Indonesia hit waters off the westernmost Aceh province.

The US Geological Survey said the quake was centred 33 kilometres beneath the ocean floor around 495 kilometres from the provincial capital of Banda Aceh.

Indonesia straddles a series of fault lines that makes the vast island nation prone to volcanic and seismic activity.

A giant 9.1-magnitude quake off the country on December 26, 2004, triggered a tsunami in the Indian Ocean that killed 230,000 people, nearly three quarter of them in Aceh.



Rajesh Mishra  ( News Editor  : "The Wake" Hindi Patrika)


ममता जीतीं, बशीरहाट पर भी तृणमूल का कब्जा

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बनर्जी भवानीपुर विधानसभा उपचुनाव जीत गई हैं। उन्होंने 54,000 मतों के अंतर से वाम मोर्चे की अपनी निकटतम प्रतिद्वंद्वी को हराया। उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने बशीरहाट (उत्तर) सीट भी वाम मोर्चे से छीन ली है।

एक वरिष्ठ निर्वाचन अधिकारी ने बुधवार को कहा, "ममता बनर्जी भवानीपुर से विधानसभा उपचुनाव जीत गई हैं। जीत का अंतर 54,213 मतों का रहा।" उनका मुकाबला कम्प्यूटर साइंस की प्रोफेसर और मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की उम्मीदवार नंदिनी मुखर्जी से था। लोक निर्माण विभाग के मंत्री सुब्रत बख्शी ने ममता के लिए यह सीट छोड़ी थी।


एक अन्य विधानसभा सीट बशीरहाट (उत्तर) पर हुए उपचुनाव में भी तृणमूल ने बाजी मारी। तृणमूल के ए. टी. एम. अब्दुल्ला ने यहां से माकपा के सुबिद अली गाजी को हराया। माकपा विधायक मुस्तफा बिन कासिम द्वारा विधायक आवास में छत से कूदकर कर कथित रूप से आत्महत्या कर लिए जाने के बाद यहां उपचुनाव कराया गया।

पश्चिम बंगाल निर्वाचन आयोग में संयुक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी दिब्येन्दु सरकार ने कहा, "तृणमूल कांग्रेस ने बशीरहाट (उत्तर) सीट जीत ली है। जीत का अंतर 30,900 मतों से भी अधिक रहा। स्पष्ट स्थिति शाम तक सामने आएगी। अब तक 18 दौर की मतगणना हो चुकी है।"

दोनों विधानसभा क्षेत्रों में मतदान 25 सितम्बर को हुआ था। भवानीपुर में जहां 49.32 वोट पड़े, वहीं बसीरहाट (उत्तर) में 80 प्रतिशत मतदान हुआ।

गत 25 सितम्बर को इन दोनों सीटों पर हुए उपचुनाव के लिए आज सुबह आठ बजे मतगणना शुरू हुई थी।

MAMTA BANERJEE or JAYALALITA

ममता बनर्जी और जयललिता की संघर्ष भरी कहानी

जयललिता जयराम और ममता बनर्जी में कुछ भी ऐसा नहीं है जिसमें समानता खोजी जा सके. दोनों में सिर्फ एक बात सामान्य है कि दोनों का जन्म अति सामान्य परिवार में हुआ था और अति सामान्य घर से निकलकर दोनों ने सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने की यात्रा की. अगर अपना घर परिवार पालने के लिए ममता बनर्जी ने अपने पिता के निधन के बाद दूध बेचने तक का काम किया है तो जयललिता ने भी बिना पिता के जीवन जीया है और भूख गरीबी बेरोजगारी की मार झेली है. लेकिन राजनीति में आने के बाद एक अगर रानी की पदवी पर आसीन हो जाती है तो दूसरी शेरनी बन जाती है.

ममता बनर्जी
ममता बनर्जी मुख्यमंत्री
पश्चिम बंगाल 
रेल मंत्री ममता बनर्जी का जन्म 5 जनवरी, 1955 को कोलकाता के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। ममता छात्र जीवन से ही राजनीति में दिलचस्पी लेने लगीं थीं। लेकिन 70 के दशक में वह कांग्रेस की सक्रिय कार्यकर्ता बन गई। 1976 में ममता ‘बंगाल महिला कांग्रेस’ की महासचिव चुनी गईं। उसी दौरान जयप्रकाश नारायण की कार के बोनट पर कूदकर वह सुर्खियों में आ गईं। धीरे-धीरे बंगाल की राजनीति में ममता अपनी पैठ जमाती चली गईं। 1984 के चुनाव में जादवपुर सीट से सोमनाथ चटर्जी को हराकर ममता बनर्जी ने सबसे युवा सांसद बनने का इतिहास रचा। इसके बाद 1989 में कांग्रेस विरोधी माहौल में ममता सांसद का चुनाव हार गईं, लेकिन 1991 के आमचुनावों में उन्होंने दक्षिण कलकत्ता सीट से जीत दर्ज की। 1996, 1998, 1999, 2004 और 2009 के चुनावों में ममता ने इस सीट पर लगातार अपना कब्जा बरकरार रखा। 1991 में राव सरकार में ममता मानव संसाधन विकास, खेल और युवा कल्याण तथा महिला एवं बाल विकास मंत्री भी रहीं। अप्रैल 1993 में ममता से मंत्रीपद ले लिया गया था।
ममता बनर्जी अक्सर अपने उग्र और विरोधी स्वभाव के चलते विवादों में रही हैं। ममता ने 1996 में अलिपुर की एक रैली के दौरान अपने गले में काली शॉल से फांसी लगाने की धमकी भी दी थी। वह जुलाई 1996 में सरकार द्वारा पेट्रोल की कीमतें बढ़ाए जाने पर सरकार का हिस्सा रहते हुए, लोकसभा के पटल पर ही विरोध में पालथी मारकर बैठ गई थीं। ममता ने इसी दौरान तत्कालीन समाजवादी पार्टी सांसद अमर सिंह का कॉलर भी पकड़ लिया था। फरवरी 1997 में रेल बजट पेश होने के दौरान ममता ने रेलमंत्री रामविलास पासवान पर अपनी शॉल फेंककर बंगाल की अनदेखी के विरोध में अपने इस्तीफे की घोषणा कर दी थी। बाद में उन्होंने अपना इस्तीफा वापस भी ले लिया था। 11 दिसंबर, 1998 को ममता ने समाजवादी पार्टी के सांसद दरोगा प्रसाद सरोज को महिला आरक्षण बिल का विरोध करने पर कॉलर पकड़कर संसद के बाहर खींच लिया था। कांग्रेस से अलग होकर ममता ने 1 जनवरी, 1998 को अपनी पार्टी आल इंडिया तृणमूल कांग्रेस का गठन किया। 1999 में एनडीए की गठबंधन सरकार में वह रेलमंत्री रहीं। ज्यादा दिनों तक वह सरकार के गठबंधन का हिस्सा नहीं रह सकी। और 2001 में सरकार से अलग हो गई। इसके बाद 2004 में चुनाव से पहले वह फिर एनडीए सरकार में आई और खदान एवं कोयला मंत्री रहीं। 2004 चुनाव में ममता की पार्टी की बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा। 2009 के चुनाव में उनकी पार्टी ने अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया।
ममता ने नंदीग्राम में किसानों की ज़मीन अधिग्रहण करने के सरकारी फ़ैसले के ख़िलाफ़ भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी (बीयूपीसी) का भी समर्थन किया। उन्होंने नंदीग्राम में रसायन केंद्र (केमिकल हब) बनाने की राज्य सरकार की योजना का विरोध किया। ममता राजनीति के अलावा चित्रकारी और लेखन में भी रुचि रखती हैं। वे एक अच्छी रसोईया भी हैं। वे धार्मिक भी हैं और हर साल काली पूजा में जरूर हिस्सा लेती हैं।
कुंवारी ममता बनर्जी ने जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव देखे हैं। लेकिन उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में सादगी को बनाए रखा है। ममता गहनों या कपड़ों पर कभी खर्च नहीं करती हैं और बेहद सादा जीवन व्यतीत करती हैं। वह हमेशा सादी सूती साड़ी, कंधे पर एक झोले और रबड़ की चप्पल पहने नजर आती हैं। पार्टी और समर्थकों के बीच में दीदी के नाम से जानी जाती हैं। वे सात बार संसद सदस्य चुनी गईं। साल 2009 के और इस बार के चुनावों में भी ममता का नारा ‘मां, माटी और मानुष’ था। पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे के 34 साल पुराने किले को ढहाने के बाद ममता के मुख्यमंत्री बनना लगभग तय माना जा रहा है।
जयललिता
जयललिता, मुख्यमंत्री- तमिलनाडु
24 फरवरी, 1948 को जयललिता का जन्म कर्नाटक में एक तमिल अय्यर परिवार में हुआ था। जयललिता के बचपन का नाम कोमलवल्ली है। मात्र दो वर्ष की उम्र में जयललिता के पिता उनकी माता को छोड़कर चले गए थे। बचपन से ही जयललिता ने गरीबी, भूख और मजबूरी का जीवन देखा। 2011 में जिस श्रीरंगम सीट से जीतकर वे विधानसभा पहुंची हैं वह श्रीरंगम ही उनका मूल स्थान है। शुरुआती शिक्षा दीक्षा बंगलौर में ही हुई लेकिन बाद में उनकी मां उन्हें लेकर मद्रास चली गयी। उनकी मां संध्या ने पहले तमिल फिल्मों में काम करना शुरू किया। पढ़ने में तेजतर्रार जयललिता को भारत सरकार ने आगे की पढ़ाई के लिए स्कालरशिप देने की पेशकश की लेकिन जयललिता ने तय किया वे फिल्मों में अपना कैरियर बनाएंगी।
तमिलनाडु में रहते हुए भी जयललिता ने अपने फिल्मी कैरियर की शुरूआत कन्नड फिल्म 1964 में चिन्नदा गोम्बे से की. 1965 में उन्होंने पहली तमिल फिल्म जिसके बाद जयललिता ने पहले तमिल सिनेमा में खुद को स्थापित किया और बाद में तमिलनाडु की राजनीति में धाक जमाई।
1981 में जयललिता अन्ना डीएमके पार्टी में शामिल हुई थीं और 1988 में राज्य सभा के लिए नामांकित की गईं। इसी साल वह सांसद भी बन गईं। एम जी रामाचंद्रन के साथ उनकी नजदीकियों ने उन्हें राजनीति में स्थापित होने में मदद की।
एम जी रामाचंद्रन की मौत के बाद उनकी पत्नी की जगह जयललिता को टिकट दिया गया जिसपर काफी बवाल भी मचा, पर जयललिता ने 1989 के चुनावों में जीत हासिल की और विपक्ष की तरफ से जीतने वाली पहली महिला बनीं। 1991 में राजीव गांधी की मौत के बाद जयललिता ने कांग्रेस का दामन थाम लिया। जहां जयललिता को सफलता मिली और वह तमिलनाडु की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। 1996 में जयललिता को डीएमके से हार झेलनी पड़ी।
जयललिता का राजनीतिक जीवन विवादों से घिरा रहा है। सरकारी धन का निजी सुखों के लिए इस्तेमाल करने और धोखाधड़ी के मामले उनके ख़िलाफ दायर हैं।
जयललिता 1989, 1991  में लोकसभा का चुनाव जीती लेकिन 1996  के चुनाव में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा था।  जबकी 2001  और 2006  में एक ही जगह से दो बार एमएलए का चुनाव जीती। जयललिता वर्ष 1991 से 1996 और 2002 से 2006  तक दो बार राज्य की मुख्यमंत्री बनी। अब 2011 में तमिलनाडु की तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने जा रही हैं.
दोनों में कोई समानता नहीं
राजेश मिश्रा, कोलकाता, पश्चिम बंगाल 
जयललिता और ममता बनर्जी के जीवनशैली में कोई समानता नहीं है. एक ओर जहां जयललिता के वार्डरोड में 10 हजार से अधिक साड़ियों हजारों जोड़ी जूते चप्पल भरे हैं वही ममता बनर्जी बहुत ही सीधी सादी जिंदगी जीती हैं. पोएश गार्डन में रहनेवाली जयललिता का सामान्य से घर में रहनेवाली ममता बनर्जी से कोई तालमेल नहीं हो सकता. जयललिता पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं लेकिन ममता बनर्जी को भ्रष्टाचार से सख्त नफरत है. अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में ममता बनर्जी ने रेलमंत्री रहते हुए अपने ही कनिष्ठ को हटाने का अभियान चला दिया था जो बाद में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष बने और तहलका टीम से एक लाख रूपया लेने के आरोप में राजनीति से हमेशा के लिए विदा हो गये. जयललिता को मंहगी गाड़िया, ज्वेलरी और आलीशान लाइफ स्टाइल पसंद है तो ममता बनर्जी सूती साड़ी और हवाई चप्पल से संतुष्ट रहती हैं. हाल फिलहाल तक उनके पास उनकी एक पुरानी फिएट कार थी जिससे बतौर रेलमंत्री वे रेलभवन आती जाती थीं.

Mamata Banerjee's Biography / মমতা ব্যানার্জী সম্পর্কে ...

ममता बनर्जी की जीवनी

ममता बनर्जी , मुख्यमंत्री
पश्चिम बंगाल 
ममता बनर्जी भारतीय राज्य पश्चिम बंगाल की वर्तमान मुख्यमंत्री एवं तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख हैं। ममता बनर्जी का जन्म कोलकाता में 5 जनवरी, 1955 को हुआ था। ये अपने समर्थकों में 'दीदी' (बड़ी बहन) के नाम से अत्यधिक लोकप्रिय हैं। सूती साड़ी, हवाई चप्पल, कंधे पर कपड़े का थैला और चेहरे पर हमेशा संघर्ष के भाव, इनकी मुख्य पहचान हैं। तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी अपनी सादगी और संघर्ष की बुनियाद पर पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा के 34 साल पुराने क़िले को ढहाने में सफल रहीं। ममता का व्यक्तित्व एक ज़मीनी, संघर्षशील, तेज़ तर्रार और मुखर नेता के समान है। वह छोटे फायदे के लिए कभी अपने लक्ष्य से नहीं भटकी।

ममता दीदी की शिक्षा

ममता बनर्जी ने 'बसंती देवी कॉलेज से अपनी स्नातक की शिक्षा को पूर्ण किया। बाद में आपने 'जोगेश चंद्र चौधरी लॉ कॉलेज' से अपनी क़ानून की डिग्री प्राप्त की।

दीदी का रहन-सहन 

ममता रबड़ की चप्पल, संकरी किनारी वाली सूती साड़ी की पहचान बन गई हैं। अब भी वह लाल खपरैल की छत वाले घर में रहती हैं। नियमित रूप से ट्रेडमिल पर अभ्यास करती हैं। सुबह अपनी पार्टी के सहयोगियों से बातचीत करती हैं, बैठकों, रैलियों और रेलवे से जुड़े समारोहों से निबटने के बाद ही आराम करती हैं।
संघर्ष के दिन

कभी ऐसा समय भी था, जब ममता बनर्जी को ग़रीबी से संघर्ष करते हुए दूध बेचने का काम भी करना पड़ा था। उनके लिए अपने छोटे भाई-बहनों के पालन-पोषण में अपनी विधवा माँ की मदद करने का यही अकेला तरीका था। ममता के पिता स्वतंत्रता सेनानी थे और जब वे बहुत छोटी थीं, तभी उनकी मृत्यु हो गई थी। बाद में उन्होंने अपने परिवार को चलाने के लिए दूध विक्रेता का कार्य करने का निर्णय लिया। मुसीबत के उन दिनों ने ममता को सख्त बना दिया और उन्होंने पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों को सत्ता से बेदख़ल करने के अपने सपने को पूरा करने में दशकों गुजार दिए।

ममता दीदी का राजनीति

पश्चिम बंगाल में यूथ कांग्रेस की अध्यक्ष के तौर पर ममता बनर्जी ने राजनीति की शुरुआत की। ये पहली बार 1984 में सोमनाथ चटर्जी को हराकर जादवपुर सीट से लोक सभा में पहुँची। कांग्रेस से अलग होने के बाद इन्होंने 1997 में तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की। दक्षिण कोलकाता सीट से 1991, 1996, 1998, 1999, 2004 और 2009 में इन्हें लोकसभा के लिए चुना गया। ममता बनर्जी दो बार रेल मंत्री रह चुकी हैं। इन्होंने पहले राजग के साथ गठबंधन में और फिर संप्रग सरकार-दो में यह ज़िम्मेदारी संभाली। क़रीब 13 साल के संघर्ष के बाद आखिरकार पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा को हटाकर ममता बनर्जी इतिहास रचने में सफल रहीं।

पहली मुख्यमंत्री बनीं ममता बनर्जी 

Mamta  Banerjee swearing
in ceremony, Rajbhavan  
तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने शुक्रवार, 20 मई-2011 को पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण की। इन्होंने ने केवल राज्य में 34 साल के वामपंथी शासन का अंत किया, बल्कि राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री बनने का गौरव भी हासिल किया। हमेशा की तरह ममत बनर्जीसफ़ेद साड़ी पहनकर समारोह स्थल पहुँची थी। राज्यपाल एम. के. नारायणन ने दोपहर एक बजकर एक मिनट पर राजभवन में उन्हें पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई। ममता ने यह समय स्वयं तय किया था। राज्य की 11वीं मुख्यमंत्री बनी ममता ने बांग्ला में शपथ ली। ममता बनर्जी के साथ तृणमूल कांग्रेस के 36 मंत्री व कांग्रेस के 7 मंत्रियों ने भी शपथ ली।

ममता का राजनीतिक सफर

देश की शक्तिशाली नेताओं में शुमार ममता बनर्जी के जीवन की कुछ महत्वपूर्ण घटनाएँ इस प्रकार हैं-

  • 1970: में कांग्रेस पार्टी की कार्यकर्ता बनी|
  • 1976-1980 : ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल महिला कांग्रेस की महासचिव बनीं।
  • 1984 : ममता ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के वरिष्ठ नेता सोमनाथ चटर्जी को जादवपुर लोक सभा सीट से हराया। उन्हें देश की सबसे युवा सांसद बनने का गौरव भी प्राप्त हुआ। उन्हें अखिल भारतीय युवा कांग्रेस का महासचिव बनाया गया।
  • 1989 : कांग्रेस विरोधी लहर में ममता जादवपुर लोक सभा सीट पर मालिनी भट्टाचार्य से पराजित हुईं।
  • 1991 : ममता दोबारा लोक सभा की सदस्य बनीं। उन्होंने दक्षिणी कलकत्ता (कोलकाता) लोक सभा सीट से माकपा के बिप्लव दासगुप्ता को पराजित किया। वर्ष 1996, 1998, 1999, 2004 और 2009 में वह इसी सीट से लोकसभा सदस्य निर्वाचित हुईं।
  • अगस्त 1989 : दक्षिण कोलकाता में हजरा क्रांसिंग पर विरोध प्रदर्शन के दौरान माकपा के कार्यकर्ताओं द्वारा कथित तौर पर पीटे जाने की वजह से उनके सिर में चोटें आईं।
  • 1991 : कोलकाता से लोकसभा के लिए चुनी गई। नरसिम्हा राव सरकार में मानव संसाधन विकास, युवा मामलों और महिला एवं बाल विकास विभाग में राज्य मंत्री बनीं। नरसिम्हां राव सरकार में खेल मंत्री बनाई गई।
  • 21 जुलाई, 1993 : ममता के नेतृत्व में युवा कांग्रेस समर्थकों का दल 'रॉयटर्स बिल्डिंग' की तरफ बढ़ रहा था उसी समय की गई गोलीबारी में 13 कार्यकर्ताओं की मौत हो गई। वे मतदाता पहचान पत्र को मतदान के लिए एकमात्र दस्तावेज़ माने जाने की माँग कर रहे थे।
  • जुलाई 1996 : मंत्री होने के बावजूद ममता ने लोक सभा में पेट्रोल की क़ीमतों में वृद्धि का विरोध किया।
  • 1996 से 2009 तक दक्षिण कोलकाता लोकसभा सीट से विजयी होती रही हैं।
  • फ़रवरी 1997 : तत्कालीन रेल मंत्री 'रामविलास पासवान' के रेल बजट में पश्चिम बंगाल को नजरअंदाज़ करने की बात कहते हुए ममता ने अपनी शाल उनके ऊपर फेंक दी और अपने इस्तीफे की घोषणा की।
  • 22 दिसम्बर, 1997 : ममता ने कांग्रेस छोड़ी और कोलकाता में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस का गठन करने की घोषणा की।
  • 1 जनवरी, 1998 : तृणमूल कांग्रेस औपचारिक रूप से अस्तित्व में आई।
  • 1998 और 1999 : भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ सीटों का बँटवारा कर लोक सभा का चुनाव लड़ा।
  • 1999 : राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के नेतृत्व में बनने वाली सरकार में तृणमूल कांग्रेस भी शामिल हुई और ममता रेल मंत्री बनी।
  • 2001: तहलका के खुलासे के बाद राजग छोड़ दिया।
  • मार्च 2001 : राजग छोड़कर राज्य विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस गठबंधन में शामिल हुईं। चुनाव में वाम मोर्चे को 199 और तृणमूल-कांग्रेस गठबंधन को 86 सीटें मिलीं।
  • अगस्त 2001 : ममता बनर्जी पुन: राजग में लौंटी आईं।
  • जनवरी 2004 : केंद्रीय कोयला एवं खदान मंत्री बनीं। लोक सभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने ख़राब प्रदर्शन किया। पश्चिम बंगाल में ममता की पार्टी को केवल एक सीट मिली।
  • 2005: प. बंगाल के नंदीग्राम में इंडोनेशियन समूह सलीम के निवेश का विरोध किया
  • मई 2006 : तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा के साथ मिलकर विधानसभा का चुनाव लड़ा, लेकिन प्रदर्शन ख़राब रहा। इस गठबंध को केवल 30 सीटें मिली, जबकि वाम मोर्चा को 233 सीटें मिली।
  • नवम्बर 2006 : पश्चिम बंगाल में हुगली ज़िले के सिंगूर में टाटा मोटर्स की प्रस्तावित परियोजना का विरोध किया और 12 घंटे के बंद का ऐलान किया। तृणमूल कांग्रेस के विधायकों ने विधानसभा में तोड़फोड़ की।
  • दिसम्बर 2006 : सिंगूर में अनिच्छुक किसानों की अधिग्रहित ज़मीन वापस लौटाने की माँग को लेकर ममता बनर्जी ने शहर में स्थित मेट्रो चैनल पर 25 दिनों की भूख हड़ताल की। यू पी ए सरकार में रेल मंत्री बनाई गई
  • मार्च 14, 2007 : पश्चिमी मिदनापुर ज़िले के नंदीग्राम में पश्चिम बंगाल सरकार की भूमि अधिग्रहण योजना का विरोध कर रहे किसानों पर पुलिस द्वारा की गई गोलीबारी में 14 किसानों की मौत हो गई।
  • 14 नवम्बर, 2007 : बंगाल में प्रख्यात बुद्धिजीवियों ने तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के साथ कोलकाता से नंदीग्राम तक एक शांति मार्च निकाला।
  • मई 2008 : तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिमी मिदनापुर और दक्षिण 24 परगना की ज़िला परिषद की सीट पर क़ब्ज़ा कर लिया। यह सीट वाम मोर्चे के क़ब्ज़े में थी। तृणमूल कांग्रेस ने नंदीग्राम और सिंगूर में भी वाम मोर्चे का सफाया कर दिया।
  • अपने चुनाव अभियान के लिए पैसा जुटाने के लिए ममता बनर्जी काफ़ी व्यस्त रहीं। वर्ष 2007 और 2008 में अपने तैल चित्रों की बिक्री कर चार लाख और 15 लाख रुपये कमाये और इसे दान कर दिया।
  • 2009 : कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस ने एक साथ मिलकर लोक सभा चुनाव लड़ा। तृणमूल को पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीटों में से 26 पर जीत हासिल हुई। ममता एक बार फिर रेल मंत्री बनीं।
  • जून 2010 : नगर निगम चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने कोलकाता नगर निगम पर अपना परचम लहराया। कोलकाता नगर निगम पर तृणमूल कांग्रेस ने 62 सीटों के अंतर से कब्जा जमाया।
  • 18 मार्च, 2011 : ममता ने कांग्रेस के साथ मिलकर पश्चिम बंगाल विधानसभा का चुनाव लड़ा।
  • 13 मई, 2011 : विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस-कांग्रेस गठबंधन ने राज्य की 294 सीटों में से 227 पर अपना परचम लहराया।
  • मई 20, 2011 : ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।

ममता  कवयित्री भी हैं.....

बंगाल के जनमानस में ‘पोरीबोर्तन’ का सपना भरने वाली, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री एवं तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी के जीवन का एक अनजाना पहलू यह भी है कि, वे एक संवेदनशील कवयित्री हैं। उनकी कविताओं में भी ‘बदरंग’ हो चुकी राजनीति के ‘पोरीबर्तन’ (बदलाव) की छटपटाहट है और साथ-साथ इसकी इस आशय की हुंकार भी है। सुश्री बनर्जी की इस आशय की कविता ‘राजनीति’ इसी मनोव्यथा को दर्शाती है और ख़ासी चर्चित है।


‘राजनीति’ एक शब्द, जिससे मन में कभी जागता था श्रद्धाभाव
अब हो गये हैं इसके मायने बड़ा कारोबार
पार्टी के दफ्तर बन गये हैं बाज़ार
सच, राजनीति बनकर रह गयी है ‘गंदा खेल’
‘राजनीति’ जो होनी चाहिए थी सिद्धांतों और मूल्यों का पर्याय
समय ने बदला है इसका अर्थ अब है यह है अपराध की पाठशाला
नहीं बीता है बहुत वक़्त जब राजनीति की कुंजी थी ‘जनशक्ति’
अफ़सोस, अब इसके मायने हो गये हैं ‘धनशक्ति’
भरोसा, ईमानदारी, निष्ठा है ये शब्द बेहद नेक, बेहद पाक
लेकिन गायब होते जा रहे हैं धीरे-धीरे अब ये राजनीति के शब्दकोष से
‘राजनीति है जनसेवा, देशसेवा’ बनती जा रही हैं ये सब बातें
अब भूली-बिसरी-सी यादें
राजनीति तो है आज ग्लैमर और फैशन
‘सच’ ग्लैमर और फैशन
बदलने ही होंगे हमें ये हालात, बदलनी होगी राजनीति की बदरंग तस्वीर
कहीं ऐसा न हो हिमालय कि यह गंगा
गंदगी के भंवरजाल में डूब जाये, समा जाए।

Mamata Banerjee's Biography

माँ-माटी-मानुष :  सदा जीवन उच्च विचार
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, कोलकाता
Mamata Banerjee, the Indian state of West Bengal chief minister and Trinamool Congress chief is present. Mamata Banerjee in Calcutta January 5, 1955 took place. These supporters "Didi" (elder sister) as the most popular. Cotton sari, slipper, cloth bag on the shoulder and face always the sense of conflict, are their hallmark. Trinamool Congress chief Mamata Banerjee in West Bengal on the basis of its simplicity and the struggle of the Left was instrumental in the demolition of 34-year-old castle. A land of her personality, fighting, fast paced and is similar to the vocal leader. The small advantages not ever stray from your goal.
Sister's Mamta Banerjee education 
Mamata Banerjee, 'Basanti Devi College, completed her undergraduate education. You later 'Jogesh Chandra Chaudhuri Law College received his law degree.
Sister of the way of life 
Her rubber slippers, narrow border has become identified with a cotton sari. He still lives at home with red tile roof. That regular exercise on the treadmill. Morning talks to his party colleagues, meetings, rallies and events surrounding the Railway to deal with that after the rest. Clash of the Day
There was a time when Mamata Banerjee, the fight against poverty had to the task of selling milk. To his younger brother - sisters nurture to help his widowed mother was the only way.She was a freedom fighter's father and they were very small, then had died. To run after his family decided to do a milk seller.
sister's Mamta Banerjee politics 
West Bengal Youth Congress chief Mamata Banerjee as the beginning of politics. The first beat in 1984, Jadavpur constituency in the Lok Sabha Somnath Chatterjee did. They separated in 1997 after Congress established the Trinamool Congress. South Kolkata seat in 1991, 1996, 1998, 1999, 2004 and in 2009 he was elected to the Lok Sabha. Railway Minister Mamata Banerjee was a couple times. He in alliance with the NDA and the UPA government - took over this responsibility in two. After nearly 13 years after the conflict moved to the Left Front in West Bengal, Mamata Banerjee was instrumental in creating history.
The first chief minister Mamata Banerjee 

Mamta  Banerjee swearing
in ceremony, Rajbhavan  
Trinamool Congress chief Mamata Banerjee Friday, May 20th -2011 was sworn in as chief minister of West Bengal. He left the 34-year rule ended only in the state, but also achieved the distinction of becoming the first woman chief minister. Mmt Bnerjeesfed always reached the venue wearing a sari.Governor M.. Narayanan, a little after noon on a minute oath of office administered to the Raj Bhavan. She decided it was time itself. She became the 11th chief minister of state sworn in Bengal. With Mamata Banerjee's Trinamool Congress and Congress 7 ministers and 36 ministers took oath.
Mamata's politics 
Mamata Banerjee's life among the country's powerful politicians, some important events are as follows -

  • 1970: Congress party workers in the | 
  • 1976-1980: Congress leader Mamata Banerjee in West Bengal were women. 
  • 1984: Banerjee CPI (M) leader Somnath Chatterjee in the Jadavpur Lok Sabha seat defeating. He had the distinction of becoming the country's youngest MP. He was General Secretary of All India Youth Congress. 
  • 1989: anti-Congress wave in the Jadavpur Lok Sabha seat Malini Bhattacharya lose her. 
  • 1991: She again became a member of Lok Sabha. The South Calcutta (Kolkata) Lok Sabha seat defeating the CPM Biplv Dasgupta. Years 1996, 1998, 1999, 2004 and in 2009 he was elected Member of Parliament from the seat. 
  • August 1989: South Kolkata Hazra Kransing CPI-M activists during the protest due to the alleged beating suffered in their heads. 
  • 1991: elected to Lok Sabha from Kolkata. Narasimha Rao's human resource development, youth affairs and became Minister of State for Women and Child Development Department. Nrsimhan made sports minister in the Rao government. 
  • July 21, 1993: Youth Congress supporters led by her party, the Reuters Building "was moving at the same time, 13 workers were killed in the crossfire. The voter to vote the only documents sought were considered. 
  • July 1996: Minister in the Lok Sabha even though she opposed the increase in gasoline prices. 
  • From 1996 to 2009 there had been won by the South Kolkata Lok Sabha seat. 
  • February 1997: the then Railway Minister Ram Vilas Paswan "to ignore West Bengal in the Railway Budget saying that she threw her shawl over her and announced his resignation. 
  • December 22, 1997: Mamata Kolkata leaves Congress and announced the formation of the All India Trinamool Congress. 
  • January 1, 1998: Trinamool Congress formally came into being 
  • 1998 and 1999: Bharatiya Janata Party (BJP) with the distribution of seats contested in the Lok Sabha. 
  • 1999: National Democratic Alliance (NDA) government led by the Trinamool Congress to become involved and also the Railway Minister Mamata. 
  • 2001: left the NDA after the Tehelka expose. 
  • March 2001: NDA, the assembly elections but joined the Congress Alliance. Left in the elections to the 199-TMC - Congress alliance won 86 seats. 
  • August 2001: Mamata Banerjee re-entry were Lunti. 
  • January 2004: became the Union Coal and Mines. Trinamool Congress has performed poorly in the Lok Sabha elections. In West Bengal, Mamata's party won only one seat. 
  • 2005: West. Indonesia's Salim group in Nandigram in West Bengal opposed to investment 
  • May 2006: Trinamool Congress, BJP fought the elections together, but the performance was poor. The Gtbnd only 30 seats, the Left Front won 233 seats. 
  • November 2006: West Bengal, Tata Motors at Singur in Hooghly district and opposed the proposed project announced 12-hour bandh. Trinamool Congress MLAs in the assembly of sabotage. 
  • December 2006: Singur demanding return of land acquired from unwilling farmers, Mamata Banerjee in the 25-day hunger strike on the Metro Channel. You made Minister of Railways, Government of PA 
  • March 14, 2007: West Midnapore district of West Bengal Government on Nandigram farmers oppose land acquisition plan in firing by police killed 14 farmers. 
  • November 14, 2007: In Bengal, the Trinamool Congress with the leadership of eminent intellectuals from Calcutta to Kolkata took out a peace march. 
  • May 2008: Trinamool Congress of West Midnapore and South 24 Parganas District Council, taken over the seat. The seat was in possession of the Left. Left in Nandigram and Singur, the Trinamool Congress eliminated. 
  • Mamata Banerjee to raise money for his campaign was too busy. The sale of oil paintings in 2007 and 2008, four million and 15 million earned and donated it. 
  • 2009: Congress and the Trinamool Congress contested Lok Sabha elections together. West Bengal Trinamool won on 26 out of 42 seats. She once again became Minister of Railways. 
  • June 2010: Municipal elections, the Trinamool Congress flag waved on the Kolkata Municipal Corporation. Kolkata Municipal Corporation from the Trinamool Congress won 62 seats. 
  • March 18, 2011: She contested the assembly election in West Bengal with the Congress. 
  • May 13, 2011: Assembly elections, the Trinamool Congress - Congress coalition 227 of the 294 seats, waved their flag. 
  • May 20, 2011: Mamata Banerjee was sworn in as chief minister of West Bengal. 

She is also a poet ..... 
Bengal in the mind 'Poriboartn dream of' fill, West Bengal Chief Minister and Trinamool Congress chief Mamata Banerjee's life is an unknown factor, they are a sensitive poet. In his poems 'lose' it's politics 'Poribertn' (changes) and with the restlessness - its intent is to shout. Ms. Banerjee, the effect of the poem "politics" reflects the anguish and a considerable amount is known.

'Politics' is a word, the mind ever sat pay tribute There is now big business, this means Has become the party's office market True, politics has become 'dirty' play 'Political' principles and values ​​which should be synonymous This means it is now time has changed the school of crime There's been a long time when politics was the key to 'man' Unfortunately, it's been worth it 'Dnskti' Trust, honesty, integrity words very well, very pure But there are going to disappear gradually from the Dictionary of the politics "Politics is the public, serve the nation are becoming all things Now forgotten - long forgotten - memories Glamour and fashion to politics today "Truth" Glamour and Fashion We will change this situation, will change the political picture of the discolored Lest the Ganges Himalayas Labyrinth of dirt in the sinks, to be entered.

MAMTA BANERJEE

MAMTA BANERJEE, SMILE AFTER
CHIEF MINISTER, WEST BENGAL 
ममता बनर्जी में माकपा की आवाजें

ममता बनर्जी के पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री बनने के बाद आमलोगों को लग रहा था कि राज्य सरकार की कार्यप्रणाली में कोई बदलाव आएगा। लेकिन वास्तविकता यह है कि वे लगातार उसी मार्ग पर चल रही हैं जिसे माकपा ने वाम शासन में बनाया था। प्रत्येक क्षेत्र में ममता और उनके दल के कारनामे एक ही तथ्य की पुष्टि करते हैं कि पिछले वाम शासन के रास्ते से ममता मूलतः बंधी हुई हैं। राजनीतिक दलीय उत्पीड़न, जमीन, किसान, शिक्षा, संस्कृति आदि सभी क्षेत्रों में वे अभी तक नया कुछ भी नहीं कर पायी हैं। इस बात की पुष्टि हाल ही में पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी के गठन की घोषणा से भी होती है।
पश्चिम बंग बिन्दी अकादमी से जिस तरह का अपमानजनक व्यवहार वाम सरकार ने किया था वैसा सारे देश में किसी सरकार ने नहीं किया। उल्लेखनीय बुद्धदेव भट्टाचार्य ने अपने समूचे 8 साल के मुख्यमंत्रित्वकाल में हिन्दी अकादमी का गठन ही नहीं किया था। जबकि प्रत्येक 4 साल में गठन होना चाहिए। वाम सरकार ने विगत विधानसभा चुनाव से 2 माह पहले किसी तरह अकादमी की गवर्निंग बॉडी घोषित कर दी। कम से कम ममता बनर्जी को इसबात का श्रेय जाता है कि उन्होंने चुनाव जीतने के बाद ही अकादमी गठित कर दी। लेकिन वे वाम शासन के रास्ते को छोड़ नहीं पायी हैं। विगत वाम सरकार ने हिन्दी अकादमी की गवर्निंग बॉडी में 5 ऐसे लोग रखे जो हिन्दी लिखना नहीं जानते थे, 15 ऐसे लोग रखे जो हिन्दी साक्षर-शिक्षक थे, लेकिन लेखक नहीं थे।
हाल ही में ममता बनर्जी सरकार ने पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी का गठन किया है। इसमें राज्य का एक भी बड़ा लेखक शामिल नहीं है। अकादमी में हिन्दी के अ-साहित्यिकों, भू.पू.पुलिस अफसरों और लालाओं को रखा गया है। इनमें ऐसे लोग हैं जिन्होंने सतीप्रथा और भारतीय फासिज्म का महिमामंडन किया है। ज्यादातर लोग खाकीनेकर मार्का फासिज्म के प्रचारक हैं। इन्होंने कभी भी हिन्दीभाषा और संस्कृति के लिए कुछ नहीं किया है। ज्यादातर लोगों को ठीक से हिन्दी लिखना तक नहीं आता। हां, धन कमाने और फासीवाद का प्रचार करने की कला में वे कुशल जरूर हैं। मूलतः इनलोगों का कला-साहित्य संस्कृति से कोई संबंध नहीं है।यह हिन्दी साहित्य ,जनता और लेखकों का अपमान है। ममता सरकार ने हिन्दी अकादमी को वामशासन की तरह हिन्दीसेवियों की संस्था बना दिया है।
'जनसत्ता' (कोलकाता संस्करण, 25 जुलाई 2011) के अनुसार 13 सदस्यीय कमेटी बनाई गयी है। इसमें विवेक गुप्ता (अध्यक्ष), अरूण चूडीवाल, पुष्करलाल केडिया, दिनेश बजाज, शांतिलाल जैन, सुल्तान सिंह, आरके प्रसाद,कुसुम खेमानी, राजकमल जौहरी, निर्भय मल्लिक, मंजूरानी सिंह, रूपा गुप्ता और जेके गोयल को सदस्य के रूप में रखा गया है। मजेदार बात यह है राज्य के सूचना और संस्कृति विभाग ने 29 जून 2011 को प्रेस विज्ञप्ति जारी की, लेकिन किसी भी अखबार ने इसे आज तक नहीं छापा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, जिन्हें अपनी सामान्य सी गतिविधि को टीवी को बताने में मजा आता है, उन्होंने भी इसकी मीडिया को जानकारी नहीं दी। यह खबर इतने लंबे अंतराल के बाद प्रेस में क्यों आई? क्या यह हिन्दी अकादमी के प्रति हिन्दीप्रेस का शोभनीय आचरण है? जबकि राज्य का सूचना और संस्कृति मंत्रालय स्वयं ममता बनर्जी देख रही हैं।
विगत अकादमी के गठन पर हिन्दीप्रेस ने बड़ा हंगामा किया था। लेकिन इसबार हिन्दीप्रेस ने भी यह खबर नहीं छापी। मजेदार बात यह है कि विगत अकादमी की घोषणा के बाद हिन्दी के अखबारों जैसे जागरण, प्रभातखबर, सन्मार्ग, जनसत्ता में अलेखकों को रखे जाने के खिलाफ खूब बयानबाजी छपी थी। वाम सरकार की तकरीबन सभी लेखकों ने निंदा की थी। लेकिन इसबार अकादमी का 29 जून को गठन हुआ और किसी अखबार ने 26 दिनों तक इस खबर की ओर ध्यान नहीं दिया। मैंने जब फेसबुक पर इस पर लिखा तब लोगों का इस ओर ध्यान गया और उसके बाद जनसत्ता ने खोजकर खबर बनायी। हिन्दीप्रेस की वाम सरकार के खिलाफ अति सक्रियता और ममता सरकार की एक सही खबर का प्रकाशित न होना कई सवाल खड़े करता है। असल में हिन्दी प्रेस, वाममोर्चा और ममता प्रशासन इन तीनों के लिए हिन्दी वाले वोटबैंक से ज्यादा महत्व नहीं रखते। ये लोग हिन्दीप्रेमी और हिन्दी लेखक का अंतर नहीं जानते। यह बंगला राजनीति और हिन्दी मीडिया में फैले सांस्कृतिक अज्ञान की अभिव्यक्ति है।
ममता बनर्जी सरकार ने हिन्दी अकादमी के गठन में जिस तरह हिन्दी लेखकों का अपमान किया है । सवाल उठता है क्या वे ऐसा बंगला अकादमी में कर सकती हैं ? क्या महाश्वेतादेवी के स्थान पर किसी अनपढ़ जाहिल आईपीएस अफसर या बंगला पूंजीपति को बांग्ला अकादमी का अध्यक्ष बना सकती हैं ?क्या बंगला अकादमी में बंगला लेखकों की बजाय बंगाली भाषानुरागी रखे जा सकते हैं ?
पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी का वामशासन में सबसे बुरा हाल था। विगत विधानसभा चुनाव के दो माह पहले सरकार ने गवर्निंग बॉडी बना दी। 8साल तक इसका पुनर्गठन नहीं किया। 8 सालों में कोई कार्यक्रम नहीं हुआ। अकादमी के पास ऑफिस नहीं है। निदेशक, सचिव से लेकर चपरासी तक सब पार्टटाइम हैं। अकादमी को सालाना 4 लाख रूपये के आसपास पैसा मिलता था। जिससे चपरासी, टाइपिस्ट, बिजली का बिल,फोन बिल का भुगतान होता था। ज्योति बाबू के शासनकाल से लेकर बुद्धदेव बाबू के शासनकाल तक हिन्दी अकादमी को घनघोर उपेक्षा का शिकार होना पड़ा है। राज्य सरकार ने अकादमी को कभी सामान्य संसाधन तक मुहैय्या नहीं कराए,बुनियादी सुविधाएं नहीं दीं। हम उम्मीद करते हैं नयी सरकार हिन्दी अकादमी को बुनियादी सुविधाएं और संसाधन देगी जिससे वे काम कर सकें।

इस आलेख के लेखक हैं.....जगदीश्‍वर चतुर्वेदी। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर।

Mamata Banerjee, a significant life events

MAMTA BANERJEE
মুখ্যমন্ত্রী মমতা বনর্জী

BY : RAJESH MISHRA
 RAJESH MISHRA,
KOLKATA, WEST BENGAL
ममता बनर्जी के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाएं


कोलकाता। पश्चिम बंगाल में 34 साल पुरानी वाम मोर्चा सरकार को अकेले अपने दम पर उखाड़ फेंकने वाली तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने शुक्रवार को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इसके साथ ही उन्होंने पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री होने का गौरव प्राप्त कर लिया है।

देश की शक्तिशाली नेताओं में शुमार ममता के जीवन की कुछ महत्वपूर्ण घटनाएं इस प्रकार हैं:

5 जनवरी, 1955 :
कोलकाता के प्रोमिलेश्वर व गायत्री बनर्जी के घर ममता का जन्म।

1976-1980 : ममता पश्चिम बंगाल महिला कांग्रेस की महासचिव रहीं।

1984 : ममता ने मार्क्सावादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के वरिष्ठ नेता सोमनाथ चटर्जी को जादवपुर लोकसभा सीट से हराया। उन्हें देश की सबसे युवा सांसद बनने का गौरव भी प्राप्त हुआ। उन्हें अखिल भारतीय युवा कांग्रेस का महासचिव बनाया गया।

1989 : ममता जादवपुर लोकसभा सीट पर मालिनी भट्टाचार्य से पराजित हुईं।

1991 : ममता दोबारा लोकसभा की सदस्य बनीं। उन्होंने दक्षिणी कलकत्ता लोकसभा सीट से माकपा के बिप्लव दासगुप्ता को पराजित किया। वर्ष 1996, 1998, 1999, 2004 और 2009 में वह इसी सीट से लोकसभा सदस्य निर्वाचित हुईं।

अगस्त 1989 : दक्षिण कोलकाता में हजरा क्रांसिंग पर विरोध प्रदर्शन के दौरान माकपा के कार्यकर्ताओं द्वारा कथित तौर पर पीटे जाने की वजह से उनके सिर में चोटें आईं।

1991 : नरसिम्हा राव सरकार में मानव संसाधन विकास, युवा मामलों और महिला एवं बाल विकास विभाग में राज्य मंत्री बनीं।

21 जुलाई, 1993 : ममता के नेतृत्व में युवा कांग्रेस समर्थकों का दल रॉयटर्स बिल्डिंग की तरफ बढ़ रहा था उसी समय की गई गोलीबारी में 13 कार्यकर्ताओं की मौत हो गई। वे मतदाता पहचान पत्र को मतदान के लिए एकमात्र दस्तावेज माने जाने की मांग कर रहे थे।

जुलाई 1996 : मंत्री होने के बावजूद ममता ने लोकसभा में पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि का विरोध किया।

फरवरी 1997 : तत्कालीन रेल मंत्री रामविलास पासवान के रेल बजट में पश्चिम बंगाल को नजरअंदाज करने की बात कहते हुए ममता ने अपनी शाल उनके ऊपर फेंक दी और अपने इस्तीफे की घोषणा की।

22 दिसम्बर, 1997 : ममता ने कांग्रेस छोड़ी और कोलकाता में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस का गठन करने की घोषणा की।

1 जनवरी, 1998 : तृणमूल कांग्रेस औपचारिक रूप से अस्तित्व में आई।

1998 और 1999 : भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ सीटों का बंटवारा कर लोकसभा का चुनाव लड़ा।

1999 : राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के नेतृत्व में बनने वाली सरकार में तृणमूल कांग्रेस भी शामिल हुई और ममता रेल मंत्री बनी।

मार्च 2001 : राजग छोड़कर राज्य विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस गठबंधन में शामिल हुईं। चुनाव में वाम मोर्चे को 199 और तृणमूल-कांग्रेस गठबंधन को 86 सीटें मिलीं।

अगस्त 2001 : पुन: राजग में लौंटी।

जनवरी 2004 : कोयला एवं खदान मंत्री बनीं। लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने खराब प्रदर्शन किया। पश्चिम बंगाल में ममता की पार्टी को केवल एक सीट मिली।

मई 2006 : तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा के साथ मिलकर विधानसभा का चुनाव लड़ा लेकिन प्रदर्शन खराब रहा। इस गठबंध को केवल 30 सीटें मिली जबकि वाम मोर्चा को 233 सीटें मिली।

नवम्बर 2006 : पश्चिम बंगाल में हुगली जिले के सिंगूर में टाटा मोटर्स की प्रस्तावित परियोजना का विरोध किया और 12 घंटे के बंद का ऐलान किया। तृणमूल कांग्रेस के विधायकों ने विधानसभा में तोड़फोड़ की।

दिसम्बर 2006 : सिंगूर में अनिच्छुक किसानों की अधिग्रहित जमीन वापस लौटाने की मांग को लेकर शहर में स्थित मेट्रो चैनल पर 25 दिनों की भूख हड़ताल की।

मार्च 14, 2007 : पश्चिमी मिदनापुर जिले के नंदीग्राम में पश्चिम बंगाल सरकार की भूमि अधिग्रहण योजना का विरोध कर रहे किसानों पर पुलिस द्वारा की गई गोलीबारी में 14 किसानों की मौत हो गई।

14 नवम्बर, 2007 : बंगाल में प्रख्यात बुद्धिजीवियों ने तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के साथ कोलकाता से नंदीग्राम तक एक शांति मार्च निकाला।


मई 2008 : तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिमी मिदनापुर और दक्षिण 24 परगना की जिला परिषद की सीट पर कब्जा कर लिया। यह सीट वाम मोर्चे की कब्जे में थी। तृणमूल कांग्रेस ने नंदीग्राम और सिंगूर में भी वाम मोर्चे का सफाया कर दिया।

2009 : कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस ने एक साथ मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ा। तृणमूल को पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीटों में से 26 पर जीत हासिल हुई। ममता एक बार फिर रेल मंत्री बनीं।

जून 2010 : नगर निगम चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने कोलकाता नगर निगम पर अपना परचम लहराया।

18 मार्च, 2011 : ममता ने कांग्रेस के साथ मिलकर पश्चिम बंगाल विधानसभा का चुनाव लड़ा।

13 मई, 2011 :
विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस-कांग्रेस गठबंधन ने राज्य की 294 सीटों में से 227 पर अपना परचम लहराया।

मई 20, 2011 : ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।

 RAJESH MISHRA, KOLKATA, WEST BENGAL