तुम अपने किरदार को इतना बुलंद करो कि दूसरे भाषा के विशेषज्ञ पढ़कर कहें कि ये कलम का छोटा सिपाही ऐसा है तो भीष्म साहनी, प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', हरिवंश राय बच्चन, फणीश्वर नाथ रेणु आदि कैसे रहे होंगे... गगन बेच देंगे,पवन बेच देंगे,चमन बेच देंगे,सुमन बेच देंगे.कलम के सच्चे सिपाही अगर सो गए तो वतन के मसीहा वतन बेच देंगे.

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बंगाल की ममता सरकार विफल

मुख्यमंत्री का मुस्लिमों के प्रति बढ़ता रुझान


वामपंथी शासन से पश्चिम बंगाल को मुक्त कराने वाली ममता बनर्जी की मां-माटी-मानुष की सरकार का हनीमून शायद खत्म हो चुका है। अब वह माँ-माटी-मुसलमान तक सिमित रह गया है.  वामपंथियों के खिलाफ ममता बनर्जी को राज्य की जनता ने पिछले विधानसभा चुनावों में पलकों पर बैठाया था, और उम्मीद की थी कि सादगी का पर्याय मानी जाने वाली ममता बनर्जी बंगाल में पारदर्शिता के साथ साफ-सुथरा प्रशासन देंगी, लेकिन हाल की कुछ घटनाओं से ममता बनर्जी की सरकार पर तर्जनी उठने लगी हैं।

आम जनता का कहना है की पहले जो काम 100 रूपये देकर हो जाता था अब उसके लिए 2000 देना पड़ता है। वह भी समय से काम नहीं होता। आमरी अस्पताल कांड के बाद वैसे ही ममता दीदी से खासा नाराज़ है। इसके बाद मुस्लिमों के प्रति उनकी रुझान अगले चुनाव में मुश्किल पैदा कर सकती है। ममता दीदी से सिर्फ आम जनता ही परेशान नहीं हैं... उनके पार्टी के नेता (कुछ लोगों को छोड़कर) भी उनसे नाराज़ हैं... दिनेश त्रिवेदी के इस्तीफे मुद्दे पर ही उनसे एक धड़ा काफी नाराज़ था लेकिन जैसे-तैसे मामला शांत हो गया, लेकिन लोकसभा चुनाव से पहले अगर कुछ बदलाव हो जाये, राजनितिक उठापटक हो जाये तो कुछ नया नहीं कहा जायेगा।
केन्द्र में कांग्रेस से बात बात पर भिड़नेवाली ममता सरकार के खिलाफ विपक्षी वाममोर्चा फिर एक बार गोलबन्द हो चुका है। 19 फरवरी को कोलकाता के ब्रिगेड परेड मैदान में लाखों की भीड़ का जुटाव इस बात को और पुष्ट करता है। ब्रिगेड की सभा में माकपा महासचिव प्रकाश करात, सीताराम येचुरी सहित वाममोर्चा के राज्य सचिव विमान बोस, पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने तृणमूल-कांग्रेस की साझा सरकार की नाकामियों को बिंदास तरीके से उठाया। समझा जा सकता है कि अप्रैल में होने वाले पंचायत चुनावों के पहले वामपंथियों की 19 फरवरी की कामयाब रैली ममता बनर्जी के लिए चिन्ता का कारण बन चुकी है।

ममता बनर्जी की निजी छवि साफ-सुथरी मानी जा सकती है, लेकिन उनकी सरकार के कामकाज के तरीके पर लोगों को तसल्ली नहीं है। विधाननगर और मालदह के अस्पतालों में बच्चों की मौत पर अस्प्रपताल प्रबन्धन का बचाव ममता बनर्जी की छवि पर एक दाग की तरह है। बताना प्रासंगिक है कि यही ममता बनर्जी वाममोर्चा के शासन के दौरान ऐसी घटनाओं पर आन्दोलन किया करती थीं और सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों की लापरवाही के लिए वामपंथी सरकार को दोषी ठहराया करती थीं, लेकिन जब घटना उनके शासन में हुयी तो वे बचाव में उतरीं और चिकित्सकों की लापरवाही की बात से साफ इनकार कर दिया।

हाल में एक ईसाई महिला ने पार्क स्ट्रीट थाने में बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज करायी। इस घटना की सच्चाई को भी मुख्यमंत्री ने संदेह की निगाह से देखा और कहा कि बलात्कार की बात सही नहीं है। कोलकाता के पुलिस आयुक्त रणजीत कुमार पंचनन्दा ने कहा कि बलात्कार का आरोप प्रशासन और सरकार को बदनाम करने के लिए लगाया गया है। मजे की बात है कि मुख्यमंत्री के बयान से खिन्न होकर महिला ने एक बंगला चैनल का सहारा लिया। बंगला चैनल पर उन्होंने साफ कहा कि उनके साथ बलात्कार हुआ है। एक महिला के दर्द को मां-माटी-मानुष की सरकार की मुखिया नहीं समझ पायीं, लेकिन कोलकाता पुलिस की अपराध शाखा की संयुक्त आयुक्त दमयन्ती सेन ने समझा। उन्होंने इस घटना की कड़ी तफ्तीश की और दो ही दिन में तीन अभियुक्तों को गिरफ्तार कर लिया गया। जिस गाड़ी में महिला के साथ बलात्कार हुआ, उसे भी बरामद कर लिया गया।

ममता बनर्जी से कांग्रेस के रिश्ते लगातार तल्ख होते जा रहे हैं। राज्य मंत्रिमंडल में तृणमूल के साथ कांग्रेस के भी सदस्य शामिल हैं, लेकिन पिछले दिनों हुए पनर्गठन में कांग्रेस के मंत्री मनोज भट्टाचार्य के साथ कुछ ऐसा हुआ कि उन्हें मंत्रिमंडल छोड़ने को मजबूर होना पड़ा।

बलात्कार काण्ड में नया मोड़ आ जाने के बाद मुख्यमंत्री की किरकिरी स्वाभाविक थी। कोलकाता के मीडिया ने इस घटना को प्रमुखता से स्थान दिया। नतीजा यह हुआ कि सोमवार 20 फरवरी को मुख्यमंत्री ने राज्य सचिवालय में दमयन्ती सेन को बुलाकर बातचीत की। बाद में सरकार का बचाव करते हुए दमयन्ती सेन को मजबूरन कहना पड़ा कि इस घटना में नया मोड़ उनकी नहीं, बल्कि कोलकाता पुलिस के सम्मिलित कामयाबी है। वरिष्ट पुलिस अधिकारी का 20 फरवरी का प्रेस सम्मेलन भी स्पष्ट करता है कि राज्य सरकार बचाव की मुद्रा में है।

यही नहीं, 9 दिसम्बर को एक निजी अस्पताल में आग की घटना के बाद जिस तरह से गिरफ्तारी में भेदबाव बरता गया, उस पर औद्योगिक जगत में खिन्नता है। इस अस्पताल में आग लगने की घटना के कुछ घण्टों बाद ही अवैध शराब (चुल्लू) पीने से 175 से अधिक लोगों की मौत हुयी थी। मुख्यमंत्री ने अवैध शराब पीकर मरने वाले लोगों के परिजनों को तुरन्त दो-दो लाख के मुआवजे से नवाजा। मुख्यमंत्री के इस निणर्य भी लोग सवाल उटा रहे हैं कि अवैध शराब पीने वालों के लिए उन्होंने राजनैतिक फायदा हासिल करने के लिए मुआवजा दिया।
ममता बनर्जी के सरकार में आने के बाद उम्मीद की जा रही थी कि राज्य में आथिर्क निवेश बढ़ेगा, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। बंगाल लीड्स के नाम से राज्य सरकार की ओर से निवेशकों को आकर्षित करने के लिए कार्यक्रम किया गया था, लेकिन उसे भी अपेक्षित कामयाबी नहीं मिली। केंद्र से हजारों करोड़ के आर्थिक सहयोग को लगातार नकार रहीं ममता बनर्जी की सरकार को आने वाले दिनों में और विरोध का सामना करना पड़ सकता है।

इन परिस्थितियों में हम कह सकते हैं कि जिन ममता बनर्जी को बंगाल की जनता ने पलकों पर बैठाया था, वे मात्र 9 महीनों के शासन में ही जनता की आंखों की किरकिरी बनने लगी हैं। ममता सरकार के कामकाज के तरीकों से पुलिस और प्रशासन में भी माहौल ठीक नहीं है। कई वरिष्ट आईएएस व आईपीएस अधिकारियों ने राज्य के बाहर डेपुटेशन पर जाने की गुहार केंद्र से लगायी है। ताजा सूचना के अनुसार वरिष्ठ आईपीएस दमयन्ती सेन ने भी हाल ही में ऐसी अर्जी दी है।

ममता जीतीं, बशीरहाट पर भी तृणमूल का कब्जा

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बनर्जी भवानीपुर विधानसभा उपचुनाव जीत गई हैं। उन्होंने 54,000 मतों के अंतर से वाम मोर्चे की अपनी निकटतम प्रतिद्वंद्वी को हराया। उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने बशीरहाट (उत्तर) सीट भी वाम मोर्चे से छीन ली है।

एक वरिष्ठ निर्वाचन अधिकारी ने बुधवार को कहा, "ममता बनर्जी भवानीपुर से विधानसभा उपचुनाव जीत गई हैं। जीत का अंतर 54,213 मतों का रहा।" उनका मुकाबला कम्प्यूटर साइंस की प्रोफेसर और मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की उम्मीदवार नंदिनी मुखर्जी से था। लोक निर्माण विभाग के मंत्री सुब्रत बख्शी ने ममता के लिए यह सीट छोड़ी थी।


एक अन्य विधानसभा सीट बशीरहाट (उत्तर) पर हुए उपचुनाव में भी तृणमूल ने बाजी मारी। तृणमूल के ए. टी. एम. अब्दुल्ला ने यहां से माकपा के सुबिद अली गाजी को हराया। माकपा विधायक मुस्तफा बिन कासिम द्वारा विधायक आवास में छत से कूदकर कर कथित रूप से आत्महत्या कर लिए जाने के बाद यहां उपचुनाव कराया गया।

पश्चिम बंगाल निर्वाचन आयोग में संयुक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी दिब्येन्दु सरकार ने कहा, "तृणमूल कांग्रेस ने बशीरहाट (उत्तर) सीट जीत ली है। जीत का अंतर 30,900 मतों से भी अधिक रहा। स्पष्ट स्थिति शाम तक सामने आएगी। अब तक 18 दौर की मतगणना हो चुकी है।"

दोनों विधानसभा क्षेत्रों में मतदान 25 सितम्बर को हुआ था। भवानीपुर में जहां 49.32 वोट पड़े, वहीं बसीरहाट (उत्तर) में 80 प्रतिशत मतदान हुआ।

गत 25 सितम्बर को इन दोनों सीटों पर हुए उपचुनाव के लिए आज सुबह आठ बजे मतगणना शुरू हुई थी।

MAMTA BANERJEE or JAYALALITA

ममता बनर्जी और जयललिता की संघर्ष भरी कहानी

जयललिता जयराम और ममता बनर्जी में कुछ भी ऐसा नहीं है जिसमें समानता खोजी जा सके. दोनों में सिर्फ एक बात सामान्य है कि दोनों का जन्म अति सामान्य परिवार में हुआ था और अति सामान्य घर से निकलकर दोनों ने सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने की यात्रा की. अगर अपना घर परिवार पालने के लिए ममता बनर्जी ने अपने पिता के निधन के बाद दूध बेचने तक का काम किया है तो जयललिता ने भी बिना पिता के जीवन जीया है और भूख गरीबी बेरोजगारी की मार झेली है. लेकिन राजनीति में आने के बाद एक अगर रानी की पदवी पर आसीन हो जाती है तो दूसरी शेरनी बन जाती है.

ममता बनर्जी
ममता बनर्जी मुख्यमंत्री
पश्चिम बंगाल 
रेल मंत्री ममता बनर्जी का जन्म 5 जनवरी, 1955 को कोलकाता के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। ममता छात्र जीवन से ही राजनीति में दिलचस्पी लेने लगीं थीं। लेकिन 70 के दशक में वह कांग्रेस की सक्रिय कार्यकर्ता बन गई। 1976 में ममता ‘बंगाल महिला कांग्रेस’ की महासचिव चुनी गईं। उसी दौरान जयप्रकाश नारायण की कार के बोनट पर कूदकर वह सुर्खियों में आ गईं। धीरे-धीरे बंगाल की राजनीति में ममता अपनी पैठ जमाती चली गईं। 1984 के चुनाव में जादवपुर सीट से सोमनाथ चटर्जी को हराकर ममता बनर्जी ने सबसे युवा सांसद बनने का इतिहास रचा। इसके बाद 1989 में कांग्रेस विरोधी माहौल में ममता सांसद का चुनाव हार गईं, लेकिन 1991 के आमचुनावों में उन्होंने दक्षिण कलकत्ता सीट से जीत दर्ज की। 1996, 1998, 1999, 2004 और 2009 के चुनावों में ममता ने इस सीट पर लगातार अपना कब्जा बरकरार रखा। 1991 में राव सरकार में ममता मानव संसाधन विकास, खेल और युवा कल्याण तथा महिला एवं बाल विकास मंत्री भी रहीं। अप्रैल 1993 में ममता से मंत्रीपद ले लिया गया था।
ममता बनर्जी अक्सर अपने उग्र और विरोधी स्वभाव के चलते विवादों में रही हैं। ममता ने 1996 में अलिपुर की एक रैली के दौरान अपने गले में काली शॉल से फांसी लगाने की धमकी भी दी थी। वह जुलाई 1996 में सरकार द्वारा पेट्रोल की कीमतें बढ़ाए जाने पर सरकार का हिस्सा रहते हुए, लोकसभा के पटल पर ही विरोध में पालथी मारकर बैठ गई थीं। ममता ने इसी दौरान तत्कालीन समाजवादी पार्टी सांसद अमर सिंह का कॉलर भी पकड़ लिया था। फरवरी 1997 में रेल बजट पेश होने के दौरान ममता ने रेलमंत्री रामविलास पासवान पर अपनी शॉल फेंककर बंगाल की अनदेखी के विरोध में अपने इस्तीफे की घोषणा कर दी थी। बाद में उन्होंने अपना इस्तीफा वापस भी ले लिया था। 11 दिसंबर, 1998 को ममता ने समाजवादी पार्टी के सांसद दरोगा प्रसाद सरोज को महिला आरक्षण बिल का विरोध करने पर कॉलर पकड़कर संसद के बाहर खींच लिया था। कांग्रेस से अलग होकर ममता ने 1 जनवरी, 1998 को अपनी पार्टी आल इंडिया तृणमूल कांग्रेस का गठन किया। 1999 में एनडीए की गठबंधन सरकार में वह रेलमंत्री रहीं। ज्यादा दिनों तक वह सरकार के गठबंधन का हिस्सा नहीं रह सकी। और 2001 में सरकार से अलग हो गई। इसके बाद 2004 में चुनाव से पहले वह फिर एनडीए सरकार में आई और खदान एवं कोयला मंत्री रहीं। 2004 चुनाव में ममता की पार्टी की बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा। 2009 के चुनाव में उनकी पार्टी ने अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया।
ममता ने नंदीग्राम में किसानों की ज़मीन अधिग्रहण करने के सरकारी फ़ैसले के ख़िलाफ़ भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी (बीयूपीसी) का भी समर्थन किया। उन्होंने नंदीग्राम में रसायन केंद्र (केमिकल हब) बनाने की राज्य सरकार की योजना का विरोध किया। ममता राजनीति के अलावा चित्रकारी और लेखन में भी रुचि रखती हैं। वे एक अच्छी रसोईया भी हैं। वे धार्मिक भी हैं और हर साल काली पूजा में जरूर हिस्सा लेती हैं।
कुंवारी ममता बनर्जी ने जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव देखे हैं। लेकिन उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में सादगी को बनाए रखा है। ममता गहनों या कपड़ों पर कभी खर्च नहीं करती हैं और बेहद सादा जीवन व्यतीत करती हैं। वह हमेशा सादी सूती साड़ी, कंधे पर एक झोले और रबड़ की चप्पल पहने नजर आती हैं। पार्टी और समर्थकों के बीच में दीदी के नाम से जानी जाती हैं। वे सात बार संसद सदस्य चुनी गईं। साल 2009 के और इस बार के चुनावों में भी ममता का नारा ‘मां, माटी और मानुष’ था। पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे के 34 साल पुराने किले को ढहाने के बाद ममता के मुख्यमंत्री बनना लगभग तय माना जा रहा है।
जयललिता
जयललिता, मुख्यमंत्री- तमिलनाडु
24 फरवरी, 1948 को जयललिता का जन्म कर्नाटक में एक तमिल अय्यर परिवार में हुआ था। जयललिता के बचपन का नाम कोमलवल्ली है। मात्र दो वर्ष की उम्र में जयललिता के पिता उनकी माता को छोड़कर चले गए थे। बचपन से ही जयललिता ने गरीबी, भूख और मजबूरी का जीवन देखा। 2011 में जिस श्रीरंगम सीट से जीतकर वे विधानसभा पहुंची हैं वह श्रीरंगम ही उनका मूल स्थान है। शुरुआती शिक्षा दीक्षा बंगलौर में ही हुई लेकिन बाद में उनकी मां उन्हें लेकर मद्रास चली गयी। उनकी मां संध्या ने पहले तमिल फिल्मों में काम करना शुरू किया। पढ़ने में तेजतर्रार जयललिता को भारत सरकार ने आगे की पढ़ाई के लिए स्कालरशिप देने की पेशकश की लेकिन जयललिता ने तय किया वे फिल्मों में अपना कैरियर बनाएंगी।
तमिलनाडु में रहते हुए भी जयललिता ने अपने फिल्मी कैरियर की शुरूआत कन्नड फिल्म 1964 में चिन्नदा गोम्बे से की. 1965 में उन्होंने पहली तमिल फिल्म जिसके बाद जयललिता ने पहले तमिल सिनेमा में खुद को स्थापित किया और बाद में तमिलनाडु की राजनीति में धाक जमाई।
1981 में जयललिता अन्ना डीएमके पार्टी में शामिल हुई थीं और 1988 में राज्य सभा के लिए नामांकित की गईं। इसी साल वह सांसद भी बन गईं। एम जी रामाचंद्रन के साथ उनकी नजदीकियों ने उन्हें राजनीति में स्थापित होने में मदद की।
एम जी रामाचंद्रन की मौत के बाद उनकी पत्नी की जगह जयललिता को टिकट दिया गया जिसपर काफी बवाल भी मचा, पर जयललिता ने 1989 के चुनावों में जीत हासिल की और विपक्ष की तरफ से जीतने वाली पहली महिला बनीं। 1991 में राजीव गांधी की मौत के बाद जयललिता ने कांग्रेस का दामन थाम लिया। जहां जयललिता को सफलता मिली और वह तमिलनाडु की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। 1996 में जयललिता को डीएमके से हार झेलनी पड़ी।
जयललिता का राजनीतिक जीवन विवादों से घिरा रहा है। सरकारी धन का निजी सुखों के लिए इस्तेमाल करने और धोखाधड़ी के मामले उनके ख़िलाफ दायर हैं।
जयललिता 1989, 1991  में लोकसभा का चुनाव जीती लेकिन 1996  के चुनाव में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा था।  जबकी 2001  और 2006  में एक ही जगह से दो बार एमएलए का चुनाव जीती। जयललिता वर्ष 1991 से 1996 और 2002 से 2006  तक दो बार राज्य की मुख्यमंत्री बनी। अब 2011 में तमिलनाडु की तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने जा रही हैं.
दोनों में कोई समानता नहीं
राजेश मिश्रा, कोलकाता, पश्चिम बंगाल 
जयललिता और ममता बनर्जी के जीवनशैली में कोई समानता नहीं है. एक ओर जहां जयललिता के वार्डरोड में 10 हजार से अधिक साड़ियों हजारों जोड़ी जूते चप्पल भरे हैं वही ममता बनर्जी बहुत ही सीधी सादी जिंदगी जीती हैं. पोएश गार्डन में रहनेवाली जयललिता का सामान्य से घर में रहनेवाली ममता बनर्जी से कोई तालमेल नहीं हो सकता. जयललिता पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं लेकिन ममता बनर्जी को भ्रष्टाचार से सख्त नफरत है. अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में ममता बनर्जी ने रेलमंत्री रहते हुए अपने ही कनिष्ठ को हटाने का अभियान चला दिया था जो बाद में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष बने और तहलका टीम से एक लाख रूपया लेने के आरोप में राजनीति से हमेशा के लिए विदा हो गये. जयललिता को मंहगी गाड़िया, ज्वेलरी और आलीशान लाइफ स्टाइल पसंद है तो ममता बनर्जी सूती साड़ी और हवाई चप्पल से संतुष्ट रहती हैं. हाल फिलहाल तक उनके पास उनकी एक पुरानी फिएट कार थी जिससे बतौर रेलमंत्री वे रेलभवन आती जाती थीं.

Mamata Banerjee, a significant life events

MAMTA BANERJEE
মুখ্যমন্ত্রী মমতা বনর্জী

BY : RAJESH MISHRA
 RAJESH MISHRA,
KOLKATA, WEST BENGAL
ममता बनर्जी के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाएं


कोलकाता। पश्चिम बंगाल में 34 साल पुरानी वाम मोर्चा सरकार को अकेले अपने दम पर उखाड़ फेंकने वाली तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने शुक्रवार को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इसके साथ ही उन्होंने पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री होने का गौरव प्राप्त कर लिया है।

देश की शक्तिशाली नेताओं में शुमार ममता के जीवन की कुछ महत्वपूर्ण घटनाएं इस प्रकार हैं:

5 जनवरी, 1955 :
कोलकाता के प्रोमिलेश्वर व गायत्री बनर्जी के घर ममता का जन्म।

1976-1980 : ममता पश्चिम बंगाल महिला कांग्रेस की महासचिव रहीं।

1984 : ममता ने मार्क्सावादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के वरिष्ठ नेता सोमनाथ चटर्जी को जादवपुर लोकसभा सीट से हराया। उन्हें देश की सबसे युवा सांसद बनने का गौरव भी प्राप्त हुआ। उन्हें अखिल भारतीय युवा कांग्रेस का महासचिव बनाया गया।

1989 : ममता जादवपुर लोकसभा सीट पर मालिनी भट्टाचार्य से पराजित हुईं।

1991 : ममता दोबारा लोकसभा की सदस्य बनीं। उन्होंने दक्षिणी कलकत्ता लोकसभा सीट से माकपा के बिप्लव दासगुप्ता को पराजित किया। वर्ष 1996, 1998, 1999, 2004 और 2009 में वह इसी सीट से लोकसभा सदस्य निर्वाचित हुईं।

अगस्त 1989 : दक्षिण कोलकाता में हजरा क्रांसिंग पर विरोध प्रदर्शन के दौरान माकपा के कार्यकर्ताओं द्वारा कथित तौर पर पीटे जाने की वजह से उनके सिर में चोटें आईं।

1991 : नरसिम्हा राव सरकार में मानव संसाधन विकास, युवा मामलों और महिला एवं बाल विकास विभाग में राज्य मंत्री बनीं।

21 जुलाई, 1993 : ममता के नेतृत्व में युवा कांग्रेस समर्थकों का दल रॉयटर्स बिल्डिंग की तरफ बढ़ रहा था उसी समय की गई गोलीबारी में 13 कार्यकर्ताओं की मौत हो गई। वे मतदाता पहचान पत्र को मतदान के लिए एकमात्र दस्तावेज माने जाने की मांग कर रहे थे।

जुलाई 1996 : मंत्री होने के बावजूद ममता ने लोकसभा में पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि का विरोध किया।

फरवरी 1997 : तत्कालीन रेल मंत्री रामविलास पासवान के रेल बजट में पश्चिम बंगाल को नजरअंदाज करने की बात कहते हुए ममता ने अपनी शाल उनके ऊपर फेंक दी और अपने इस्तीफे की घोषणा की।

22 दिसम्बर, 1997 : ममता ने कांग्रेस छोड़ी और कोलकाता में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस का गठन करने की घोषणा की।

1 जनवरी, 1998 : तृणमूल कांग्रेस औपचारिक रूप से अस्तित्व में आई।

1998 और 1999 : भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ सीटों का बंटवारा कर लोकसभा का चुनाव लड़ा।

1999 : राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के नेतृत्व में बनने वाली सरकार में तृणमूल कांग्रेस भी शामिल हुई और ममता रेल मंत्री बनी।

मार्च 2001 : राजग छोड़कर राज्य विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस गठबंधन में शामिल हुईं। चुनाव में वाम मोर्चे को 199 और तृणमूल-कांग्रेस गठबंधन को 86 सीटें मिलीं।

अगस्त 2001 : पुन: राजग में लौंटी।

जनवरी 2004 : कोयला एवं खदान मंत्री बनीं। लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने खराब प्रदर्शन किया। पश्चिम बंगाल में ममता की पार्टी को केवल एक सीट मिली।

मई 2006 : तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा के साथ मिलकर विधानसभा का चुनाव लड़ा लेकिन प्रदर्शन खराब रहा। इस गठबंध को केवल 30 सीटें मिली जबकि वाम मोर्चा को 233 सीटें मिली।

नवम्बर 2006 : पश्चिम बंगाल में हुगली जिले के सिंगूर में टाटा मोटर्स की प्रस्तावित परियोजना का विरोध किया और 12 घंटे के बंद का ऐलान किया। तृणमूल कांग्रेस के विधायकों ने विधानसभा में तोड़फोड़ की।

दिसम्बर 2006 : सिंगूर में अनिच्छुक किसानों की अधिग्रहित जमीन वापस लौटाने की मांग को लेकर शहर में स्थित मेट्रो चैनल पर 25 दिनों की भूख हड़ताल की।

मार्च 14, 2007 : पश्चिमी मिदनापुर जिले के नंदीग्राम में पश्चिम बंगाल सरकार की भूमि अधिग्रहण योजना का विरोध कर रहे किसानों पर पुलिस द्वारा की गई गोलीबारी में 14 किसानों की मौत हो गई।

14 नवम्बर, 2007 : बंगाल में प्रख्यात बुद्धिजीवियों ने तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के साथ कोलकाता से नंदीग्राम तक एक शांति मार्च निकाला।


मई 2008 : तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिमी मिदनापुर और दक्षिण 24 परगना की जिला परिषद की सीट पर कब्जा कर लिया। यह सीट वाम मोर्चे की कब्जे में थी। तृणमूल कांग्रेस ने नंदीग्राम और सिंगूर में भी वाम मोर्चे का सफाया कर दिया।

2009 : कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस ने एक साथ मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ा। तृणमूल को पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीटों में से 26 पर जीत हासिल हुई। ममता एक बार फिर रेल मंत्री बनीं।

जून 2010 : नगर निगम चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने कोलकाता नगर निगम पर अपना परचम लहराया।

18 मार्च, 2011 : ममता ने कांग्रेस के साथ मिलकर पश्चिम बंगाल विधानसभा का चुनाव लड़ा।

13 मई, 2011 :
विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस-कांग्रेस गठबंधन ने राज्य की 294 सीटों में से 227 पर अपना परचम लहराया।

मई 20, 2011 : ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।

 RAJESH MISHRA, KOLKATA, WEST BENGAL

MAMTA BANERJEE OR TMC (2006-2011) KI JEET


पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव परिणाम



दलगत स्थिति
राजनीतिक दल ——2006——-2011
तृणमूल कांग्रेस——-30———–184
कांग्रेस—————- 24———- 42
माकपा—————175———- 41
  • स्‍वतंत्र भारत में वामपंथ इन दिनों सबसे कमजोर स्थिति में है।
  • तीन राज्‍यों में प्रभावशाली वामपंथ पश्चिम बंगाल और केरल दोनों जगह से सत्ताच्‍युत होकर केवल त्रिपुरा में ही सत्तासीन है।
  • 13 मई 2011 को आए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव परिणाम ने तो भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी है। राज्‍य में वामपंथ का लालकिला ढह गया।
  • मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य समेत उनके मंत्रिमंडल के अधिकांश मंत्रियों को हार का मुंह देखना पड़ा।
  • ‘इतिहास का अंत, उपन्यास का अंत, सभ्यता का अंत, विचारधारा का अंत’ की तर्ज पर यहां तक कहा जा रहा है कि इसे भारत में वामपंथ के अंत के तौर पर देखा जाना चाहिए।
  • वामपंथियों ने पश्चिम बंगाल में कृषि सुधार, भूमि सुधार, सांप्रदायिक दंगा मुक्‍त राज्‍य के बूते 34 साल तक राज किया। लेकिन उनके शासन में राज्‍य में उद्योग व्‍यवस्‍था चौपट हो गई, कानून व्‍यवस्‍था ध्‍वस्‍त हो गया, राजनीतिक हिंसा और गुंडागर्दी चरम पर रही।
  • तृणमूल कांग्रेस का गठन 1 जनवरी 1998 को हुआ था और माकपा का गठन 1964 में। ममता बनर्जी के नेतृत्‍व में एक तेरह वर्षीय पार्टी ने माकपा को हरा दिया। सादगी और अपने संघर्षशील तेवर की बदौलत ममता ने यह करिश्‍मा कर दिखाया।
  • सिंगुर और नंदीग्राम में किसानों पर तथाकथित मजदूरों की वामपंथी सरकार ने मजदूरों पर ही जुल्‍म ढाए यहीं से जनता ने वामपंथ से मुंह फेरना प्रारंभ कर दिया। उसके बाद पंचायत चुनाव, लोकसभा चुनाव और बाद में विधानसभा चुनाव में वामपंथियों की करारी हार हुई।
कुछ सवाल
  • क्‍या यह वामपंथियों की तानाशाही राजनीति के मुकाबले लोकतंत्र की जीत है।
  • क्‍या वास्‍तव में भारतीय राजनीति में वामपंथ अप्रासंगिक हो गया है।
  • क्‍या वामपंथियों को कार्ल मार्क्‍स प्रणीत सिद्धांत का ही राग अलापना चाहिए या फिर उसमें समयानुकूल संशोधन करते रहना चाहिए।
  • यह वामपंथ की हार है या माकपा की हार।
  • भारत में धर्म, जाति जैसे अनेक संवेदनशील मसलों पर वामपंथियों का ढुलमुल रवैया रहा। कुछ दिनों पहले कोच्चि में माकपा की बैठक में नमाज के लिए मध्यांतर की घोषणा कर दी गई। मुसलिम कार्यकर्ताओं को रोजा तोड़ने के लिए पार्टी की तरफ से नाश्ता परोसा गया। वहीं, याद करिए जब सन् 2006 में वरिष्ठ माकपा नेता और पश्चिम बंगाल के खेल व परिवहन मंत्री सुभाष चक्रवर्ती ने बीरभूम जिले के मशहूर तारापीठ मंदिर में पूजा-अर्चना की और मंदिर से बाहर आकर कहा, ‘मैं पहले हिन्दू हूं, फिर ब्राह्मण और तब कम्युनिस्ट’ तब इस घटना के बाद, हिन्दू धर्म के विरुद्ध हमेशा षड्यंत्र रचने वाली भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्‍सवादी) के अन्दर खलबली मच गई।
  • क्‍या मार्क्‍सवाद पर नए सिरे से बहस होना चाहिए।
  • क्‍या विचारधारा आधारित राजनीति का समय गया और अब विकास आधारित राजनीति का जमाना आ गया है।
  • मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी नक्‍सलियों से गठजोड़ करके सत्ता की कुर्सी तक पहुंची हैं, इसके दूरगामी प्रभाव क्‍या होंगे?
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव परिणाम एवं भारत में वामपंथी राजनीति पर आपकी क्‍या टिप्‍पणी है। कृपया अपने विचार से इस मुद्दे पर बहस को आगे बढ़ाएं।

MAMATA MUKHYAMANTRI NIYUKT

ममता मुख्यमंत्री नियुक्त

पश्चिम बंगाल में नई सरकार के गठन के लिए तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी को आमंत्रित करने के एक दिन बाद राज्यपाल एमके नारायणन ने मंगलवार को मुख्यमंत्री के तौर पर उनकी नियुक्ति का आदेश जारी किया।
राजभवन की एक विज्ञप्ति के अनुसार, राज्यपाल भारत के संविधान के अनुच्छेद 164 [1] द्वारा उन्हें प्रदत्त अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल प्रदेश का मुख्यमंत्री नियुक्त करने का आदेश जारी करते हुए प्रसन्न हैं। नारायणन ने सोमवार को ममता बनर्जी को एक पत्र भेजकर सरकार गठन का न्योता दिया।
तृणमूल कंाग्रेस ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में जबरदस्त जीत हासिल की है। तृणमूल कांग्रेस ने रविवार को ममता को विधायक दल का नेता चुने जाने के बाद औपचारिक तौर पर सरकार गठन का दावा किया था। पार्टी विधायक दल के नवनिर्वाचित उपनेता पार्थ चटर्जी ने सोमवार को कहा था कि पार्टी ने राज्यपाल के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया है।
तृणमूल कांग्रेस ने सरकार गठन का दावा करते हुए राज्यपाल को पार्टी के 184 विधायकों की सूची जमा की। तृणमूल कांग्रेस की सहयोगी कांग्रेस ने ममता बनर्जी के नेतृत्व में सरकार के गठन के लिए समर्थन का पत्र पहले ही दे दिया है।

MAMTA BIDHAYAK DAL KI NETA CHUNI GAIN


ममता विधायक दल की नेता चुनी गई

ममता बनर्जी को रविवार को तृणमूल कांग्रेस विधायक दल का नेता चुन लिया गया।
पार्थ चटर्जी को तृणमूल कांग्रेस विधायक दल का उप नेता और शोभनदेव चट्टोपाध्याय को मुख्य सचेतक चुना गया है। ममता बनर्जी ने कहा कि उनका मंत्रिमंडल छोटा होगा जिसमें कांग्रेस और एसयूसीआई साझेदार होंगे।
हरे रंग में रंगा बंगाल
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के हाथों माकपा के लाल दुर्ग के ध्वस्त होने के बाद हरा रंग ने एक विशेष मायने अख्तियार कर लिया है।

तृणमूल कांग्रेस के लिए हरा रंग जागृति का है। उसने इसे अपने रंग के तौर पर अपनाया है जो उसके चुनाव चिह्न जोड़ा घास फूल से अभिव्यक्त होता है।

शुक्रवार की ऐतिहासिक जीत के बाद सड़कों और गलियों में ना सिर्फ हरे बल्ब जलाए गए, बल्कि ढेर सारे लोगों ने हरी टी-शर्ट पहनी, अनेक औरतों ने हरी साड़िया पहनी। कितने ही लोगों ने हरी छतरियों का इस्तेमाल किया। औरतों ने हरे रंग के बैग से अपनी खुशी का इजहार किया। जीत के जश्न में उड़ाया गया गुलाल का रंग भी हरा था।

हरे रंग का यह बहार सिर्फ कपड़ों तक नहीं था। यह रंग मिष्ठानों में भी झलका। लोगों ने हरे रंग में डुबोकर रस गुल्ले और अन्य मिठाइयों का लुत्फ लिया। 

हरे रंग का यह उफान कारोबार में भी छाया। लोगों में हरे रंग के कपड़े पहनने के बढ़े फैशन को देखते हुये यहाँ बंगाल में चारों ओर दुकानों पर हरें रंग के कपडे ज्यादा दिख रहे हैं.... ओर यह सिलसिला आज भी जारी है... 

अब सवाल यह उठता है... क्या दीदी आम जनता को भी हरियाली प्रदान करेंगी या सिर्फ यह राजनितिक हरियाली है... ?

जागो जनता जनार्दन

किसानों का, मजदूरों का
महंगाई से पिसते मजबूरों का
संतों का, महात्माओं का, 
पगडण्डी पर पड़े गावों का
देश भारतवर्ष
कैसे मनाएं हर्ष...?
जब देश की दौलत
नेता की बदौलत
देश की सीमा से परे
स्विस बैंक की तिजोरी भरे
जब भारत के गरीब लोग
भूख से तड़पकर मरे
तब हाथ पर हाथ धरे
जो खामोश रहने का कुकर्म करे
गलत को गलत बताने में
जिनकी जिह्वा  को
मार जाये लकवा
तो सुनो बचुवा
ऐसा जीना भी कोई जीना है...?
न भुज बल है न सीना है
बिल में घुसे चूहे
परिवर्तन का शंखनाद नहीं करते
जो सच के हिमायती हैं
वो कष्टों से नहीं डरते
तो बहुत हो चुका
बर्दाश्त की सीमा से बहार आओ
जिन्होंने खून चूसा है
उनका खून चूसकर दिखाओ
अभी असली आज़ादी नहीं आई है
न तेल, न धनिया, न जीरा, न राई है
किचन के कनस्तर खाली हैं
कलाली पर भीड़ है, मवाली हैं
देश को दारू के दरिया में
मत बहने दो
कलमकार को अपनी वाणी 
कहने दो
समाज को नोचने वाले गिद्धों के 
पर काट दो
जागो जनता जनार्दन
कैक्टसों को छांट दो
क्योंकि....
जिस नस्ल को मिटने का
एहसास नहीं होता
इतिहास नहीं होता.
ममता दीदी को मजबूत बनाओ
बंगाल को बर्बाद होने से बचाओ.
(मुख्य कविता राजीवजी का और संक्षिप्त जोड़ राजेश मिश्रा का)