तुम अपने किरदार को इतना बुलंद करो कि दूसरे भाषा के विशेषज्ञ पढ़कर कहें कि ये कलम का छोटा सिपाही ऐसा है तो भीष्म साहनी, प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', हरिवंश राय बच्चन, फणीश्वर नाथ रेणु आदि कैसे रहे होंगे... गगन बेच देंगे,पवन बेच देंगे,चमन बेच देंगे,सुमन बेच देंगे.कलम के सच्चे सिपाही अगर सो गए तो वतन के मसीहा वतन बेच देंगे.

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Mothers of children missing from life

बच्चो के जीवन से गायब होती मॉ





दुनिया ने आज भले ही चाहे कितनी तरक्की कर ली हो, पर हम लोगो द्वारा स्थापित दिखावे की तैयार की गई इस संस्कृति से हमारे अपने जीवन और समाज में अशांति और विषमता आज लगातार बढती जा रही है। जिसने कई बुनियादी रिश्तों के साथ ही आज समाज में मॉ और बच्चे के रिश्तों की बुनियाद को हिला कर रख दिया है। आज भागमभाग वाले इस जमाने में अधिकतर मॉओ को अपने बच्चो के पास रहने का वक्त ही नही है। आज भयंकर मंहगाई के इस दौर में रोजमर्रा की जरूरतो को पूरा करने में परिवार के दोनो पहिये कमाई करने में लगे है। नतीजन बच्चे को आया पाल रही है या फिर परिवार का दूसरा कोई सदस्य। ऐसी स्थिति में बच्चे को मॉ का प्यार दुलार नही मिल पा रहा है, वो गोद नही मिल पा रही है जिस में लेट कर वो घंटो घंटो गहरी नींद सोता है, वो कंधा नही मिल पा रहा है जिस से लग कर उसे मॉ के दिल की घडकन सुनाई देती है, वो छाती नही मिल पा रही है जिस से मुॅह लगा कर वो अपना पेट भरता है। बच्चे के जीवन के शुरूआती सालो में ही नैतिक कार्य की जडे उस में विकसित होती है अगर इस समयावधि में बच्चे की सही देखभाल न की जाये तो आगे चलकर उस के शारीरिक और मानसिक विकास और जीवन पर इस का बहुत बडा असर पडता है। स्वभाविक है कि ऐसी स्थिति में जब बच्चे को मॉ की गोद, स्नेह, दुलार नही मिलेगा तो वो सारा दिन रोते हुए ही व्यतीत करेगा। आज देखने में ये आता है कि मॉ के घर से निकलते ही आया बच्चे पर कोई ध्यान नही देती बच्चे को सोफे या पालने में डाल आया टीवी देखने में व्यस्त हो जाती है बच्चा हॅस रहा है या रो रहा है उस की सेहत पर इस का कोई असर नही पडता। बच्चा घंटो घंटो रोता रहता है बग्घी या पालने में पडा रहता है। आज बच्चो के अपहरण की वजह से हाई सोसाईटी के ये मॉ बाप अपनी आया या परिवार के किसी सदस्य को बच्चो को घर के बाहर घुमाने की इजाजत भी नही देते। आज बच्चे का समुचित विकास नही हो पा रहा है जिस से आज हमारे समाज में एक अपेक्षाकृत अक्ष्म पीढी तैयार हो रही है।
सचमुच आज हमारे समाज में ऐसा ही हो रहा आज बच्चो के जीवन से मॉ गायब हो चुकी है। अब से दो दशक पहले तक बच्चो को मॉ हमेशा अपने साथ और सीने से लगा कर रखती थी। पर अब बच्चो का ज्यादा समय बग्गी, ट्रॉली, पालने, बेबी सीट, आया की गोद या फिर कार की सीट पर बीतता है। पहले मॉ बच्चे के रोने या किसी भी हरकत पर उसे लेकर फौरन हरकत में आ जाती थी। बच्चा ज्यादा देर मॉ से दूर होकर परेशान नही हो पाता था। पर आज बच्चो को रोने के लिये छोड दिया जाता है। आज की आधुनिक मॉए इस के पीछे ये तर्क देती है कि इस से बच्चा रात में खुद भी सही से सोएगा और हमे भी चैन से सोने देगा। पहले जमाने में बच्चो को तीन चार साल तक मॉ अपना दूध पिलाती थी। आज कुछ चुंनिदा माताए ही अपने बच्चो को दूध पिलाती है। आध्ुनिक मॉए तीन दिन भी अपने नवजात बच्चे को दूध नही पिलाती और तर्क देती है कि स्तन खोलकर बच्चे को दूध पिलाने से बैकवर्ड फीलिंग होता है। फीगर बिगड जाती है वो खुद को देहाती मॉ कहलाना नही चाहती। जब कि एक शोध के अनुसार बच्चो को साथ साथ रखने, उसे सीने से लगाकर पुचकारने, दुलारने, रोने के लिये अकेला न छोडने, ज्यादातर समय घर के बाहर व्यतीत करने और महीनो की जगह वर्षो बच्चो को स्तनपान कराने से शरीर ताकतवर होने के साथ ही उन के कल्याण और नैतिक मूल्यो में वृद्वि होती है। मॉ द्वारा बच्चो का जोश-ओ-खरोश और जिम्मेदारी पूर्वक ध्यान रखने से बच्चा शांत रहने के साथ ही दिन रात चैन की नींद लेता है जिस के कारण बीमारियो से बचने के साथ ही बच्चे के शरीर का संपूर्ण विकास होता है। पहले जमाने में मॉ बाप के आलावा बच्चे का ध्यान पारिवारिक सदस्य रखते थे। पर आज गुजरे कुछ वर्षा मे हमारे घरो की तस्वीर तेजी से बदली है बच्चो से बात करने की उनके पास बैठने उसे दुलारने निहारने की आज की आधुनिक मॉ को फुरसत नही। क्यो कि वो तो नौकरी, किटटी पार्टियों ,शॉपिंग घरेलू कामो में उलझी है। दादा दादी ज्यादातर घरो में है नही। ज्यादातर हाई सोसायटी घरो में एक बच्चा है। घर में अकेला बच्चा रोने के अलावा क्या करे किस से बोले किस के साथ खेले आया के साथ माली के साथ, आखिर कब तक खेले इन से लिपट कर चिपट कर इन कंधे से लगकर उसे वो गंध वो सुगंध नही आती जो उस की मॉ की है। इन के सीने से लग कर बच्चे को वो धडकन सुनाई नही देती जो इस के मॉ के दिल से निकलती है। पडोस, पडोसी से इन पॉष कालोनी वालो का कोई वास्ता नही होता। बच्चा अकेलेपन ,सन्नाटे ,घुटन और उपेक्षा के बीच बडा होता है। बच्चे को ना तो अपने मिलते है और ना ही अपनापन। पहले जमाने में बच्चे को घर से बाहर निकलकर अलग अलग आयु वर्ग के बच्चो के साथ खेलने की पूरी आजादी थी। पर आज बच्चे को एक काल कोठरी रूपी कमरे में बंद कर दिया जाता है। जिस में उसे सोफे पर बैठ कर पूरे दिन अकेले टीवी, डीवीडी, कंप्यूटर पर वीडियो गेम्स खेलते हुए समय काटना पडता है।
आज दूधमुहे बच्चो की दुनिया लाचारी भरी होने के साथ ही उन के जीवन से मॉ का प्यार, दुलार, लोरी, मॉ की गोद और मॉ का दूध खत्म होता जा रहा है। आने वाले समय में हम किसी को ये भी नही कह कर ललकार सकते की मॉ का दूध पीया है तो सामने आजा। आज की आधुनिक मॉ को बच्चा गोद में लेकर चलने में शर्म आती है। हा अब तो बच्चे को पीठ पर कपडे के एक झिगोले में ठंूसकर लेकर चलने का चलन भी शहरों में बडी तेजी से चल निकला है। जैसे बच्चा न हो कोई सामान हो। पर मॉ की गोद की बात ही निराली होती है। मॉ के द्वारा चलते हुए थकान से बच्चे का बार बार बदलता कंधा, मॉ के दोनो हाथो का सिर से लेकर पॉव तक बच्चे को बार बार करता स्पर्ष, मॉ के धडकते हुए दिल की धडकन का बच्चे की धडकन से बार बार टकराने और इन धडकनो का एक दूसरे को महसूस करना, बच्चा पूरी तरह से मॉ के दिल में उतरा हुआ रहता था। बच्चा मॉ की ममता को पूरी षिद्दत के साथ जीता था। जिगर से जिगर के टुकडे का नाता ऐसे बनता था की एक बच्चे में एक मॉ को पूरी कायनात, कायनात की सारी खुशियाँ दिखाई देती थी। उसे उस बच्चे में अपना पूरा जीवन अपनी पूरी ताकत दिखाई देती थी। आज के दौर की मॉए आखिर ऐसी क्यो नही सोचती, क्यो ऐसा महसूस नही करती, समझ नही आता। क्या ये सब बदलाव बच्चे के जन्म देने की प्रक्रिया के बदलाव के कारण हुआ या आधुनिक समाज की संरचना ने मॉ के सामाजिक ताने बाने को बिखेर कर रख दिया शयड आज इस पर एक लम्बी बहस की जरूरत है। बच्चे के जन्म देने की प्रक्रिया भले ही बदली हो पर आज भी बच्चे के पहली बार मॉ कहने का सम्बोधन वही है। मॉ की गोद वही है, मॉ चाहे आधुनिक समाज की हो या पिछडे समाज की बच्चा चाहे प्राकृतिक तरीके से पैदा हुआ हो या मेडीकल तकनीक के द्वारा बच्चे के जन्म के बाद दोनो मॉओ की छाती में दूध एक जैसा ही उतरता है, फिर मॉ क्यो बदलती जा रही आज ये सवाल हमारे सामने एक बडा सवाल बनकर खडा हो रहा है।
दरअसल इस का एक बडा कारण ये भी है कि आज शहरो में जो मॉए प्राकृतिक रूप से बच्चो जनना पसंद नही करती वो उस मॉ बनने के अहसास को जीवन भर महसूस नही कर पाती। उस पीडा उस दर्द को महसूस ही नही करती जो मॉ और बच्चे के बीच में प्यार का रिश्ता बनाता है। आज बडे बडे शहरों में हाई सोसायटी की महिलाए बच्चा जनने की पीढा के डर से आप्रेषन द्वारा बच्चा पैदा कराना आसान समझती है। जिस कारण आज बच्चा मॉ के जिगर का टुकडा नही बन पा रहा है। नर्सिग होम का बिल चुका कर बच्चा एक बाजार से खरीदे सामान की तरह घर आ जाता है। और छोड दिया जाता व्हीकल टैक पर ट्रॅाली में गुमसुम अनाथो की तरह आया या नौकरो के हवाले ट्रॅाली धकेलने के लिये। कोई उस की कौली नही भरता उस के खिल खिलाने पर उठाकर कोई उसे चूमता नही। अपने कंधो से कोई उसे प्यार से नही लगाकर चिपकाता। आज कोई इन आधुनिक माओ को बताए की बच्चे को गोद में लेने से कोई मॉ देहाती मॉ नही कहलाता बल्कि एक जिम्मेदार मॉ कहलाई जाती है। बाजार या सडक पर बच्चे को गोद में लेकर चलने से बैकवर्ड फीलिग नही बल्कि फील गुड महसूस होता है। आज बच्चे मॉ से गोद और अपने हिस्से का दूध ही तो मॉग रहे बाकी जीवन की लडाई तो इन्हे खुद ही लडनी है।
Rajesh Mishra, Kolkata, West Bengal

MAOWADIYON KA GHINAUNA CHEHRA

माओवादियों का घिनौना चेहरा
महिलाओं से कर रहे है यौन शोषण
माओवादियों के चंगुल से भाग कर आई महिला कि आपबीती राजेश मिश्रा द्वारा 


शोषण से पूरी तरह मुक्त समाज के सुनहरे सपने दिखाने वाले माओवादी अपने साथ के कार्य कर रहे महिलाओं के साथ यौन उत्पीडन हो रहा है, इस बारे में बीच बीच में समाचार आते रहते हैं । देश के किसी भी हिस्से में किसी महिला माओवादी जब आत्मसमर्पण करती है तो आत्मसमर्पण करने के कारणों के बारे में बताते समय वह निश्चित रुप से बताती है कि पुरुष कैडर उनके साथ यौन शोषण करते हैं ।

राजेश मिश्रा, कोलकाता 
आम तौर पर आत्मसमर्पण करने वाले महिलाएं जो आपबीती बताती हैं, उनमें किसी विशेष व्यक्ति पर आरोप लगाने के बजाए किसी के नाम लिये बिना कैडरों द्वारा यौन शोषण किये जाने की बात कहती हैं । लेकिन हाल ही में ओडिशा में एक महिला माओवादी ने पुरी पुलिस के समक्ष आत्म समर्पण करते समय जो बात कही है उससे लाल गलियारे की अंदरुनी कहानी स्पष्ट हो जाती है । राजलक्ष्मी नाम की इस महिला माओवादी ने मीडिया से बातचीत के दौरान जो खुलासा किया है उससे लोगों की भलाई के लिए काम करने का दावा करने वाली माओवादियों के चेहरे पर नकाब हट गया है । उसने कहा है कि ओडिशा का टाप माओवादी नेता उनका यौन शोषण करता था।

राजलक्ष्मी ने आत्मसमर्पण करने के बाद कहा कि उन्हें बहला फूसला कर माओवादी संगठन में शामिल किया गया था । उन्होंने वहां देखा कि महिला माओवादियों का संगठन में शोषण किया जा रहा है । सैकडों की संख्या में महिला माओवादियों के साथ अनाचार किया जा रहा है ।
उन्होंने बताया कि वहां कई साल तक कार्य किया । इसी बीच उन्होंने एक और माओवादी अनिरुद्ध बेहेरा उर्फ प्रकाश के साथ प्रेम विवाह करना चाहा । लेकिन माओवादियों द्वारा इसका विरोध काफी किया गया और विवाह की अनुमति नहीं दी । विरोध के बावजूद उन्होंने प्रकाश से प्रेम विवाह किया । उनको लगता था कि विवाह के पश्चात उन्हें शारीरिक व मानसिक उत्पीडन नहीं किया जाएगा । लेकिन यह हुआ नहीं । माओवादियों के ओडिशा में सर्वोच्च नेता सव्यसाची उर्फ सुनील ने भी उनका शोषण किया ।
राजलक्ष्मी ने बताया कि उन्हें अपने पति से दूर रखा जाता था । इसके अलावा माओवादियों के नेता सव्यसाची उनके पति को दूसरे क्षेत्र में कार्य करने के लिए भेज देता थे ताकि उनका शोषण किया जा सके । इस कारण वह एक तरह से माओवादियों के बीच उनका दम घुटने लगा था । इस घुटन से बाहर निकलने के लिए उन्होंने आत्मसमर्पण किया ।
राजलक्ष्मी का यह बयान कई अर्थों में महत्वपूर्ण है । आम तौर पर माओवादियों द्वारा बताया जाता है कि वे एक वैचारिक लडाई लड रहे हैं । वैचारिक लडाई के जरिए वे शोषणमुक्त समाज की स्थापना उनका उद्देश्य है । वैचारिक लडाई वही लड सकता है जिसे वैचारिक स्पष्टता हो । जिस व्यक्ति को वैचारिक स्पष्टता न हो, वह क्या वैचारिक लडाई लडेगा । माओवादियों के पास जो फौज है, उनमें अधिकतर अनपढ हैं या फिर पोस्टर भर लिखना ही जानते हैं । इसलिए उनसे किसी प्रकार वैचारिक स्पष्टता की उम्मीद करना ही बेमानी है । लेकिन राजलक्ष्मी ने अन्य महिला माओवादियों की तरह आम कैडरों पर आरोप नहीं लगाया है बल्कि उन्होंने ओडिशा में माओवादियों के सर्वोच्च नेता पर आरोप लगाया है । स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या की जिम्मेदारी लेने वाला सव्यसाची उर्फ सुनील को वैचारिक स्पष्टता नहीं है. यह मानना शायद गलत होगा । क्योंकि सव्यसाची कोई सामान्य माओवादी कार्यकर्ता नहीं है और वह एक प्रमुख पद पर है तथा ओडिशा के माओवादियों के बीच उनका बर्चस्व काफी है । ऐसे में सव्यसाची पंडा द्वारा महिलाओं का यौन शोषण किया जाना माओवादियों के विचारधारा पर ही चोट करता है । माओवादिय़ों के बीच काम करने वाली महिला कैडरों का यौन शोषण होता है यह सर्वविदित था। महिलाओं का शोषण वहां कोई अपवाद नहीं है । लेकिन यह घटना स्पष्ट करता है कि महिलाओं का यौन शोषण करना माओवादी चरित्र का ही हिस्सा है ।
यह कहानी सिर्फ राजलक्ष्मी की नहीं है । लाल संगठन में और जंगलों में कार्य कर रहे अनेक जनजातीय महिलाएं इस तरह के शारीरिक शोषण का शीकार हो रहे हैं । कोई एक राजलक्ष्मी इसके खिलाफ विद्रोह करती है और लोगों को बताती है । शोषण का शिकार हुए अनेक राजलक्ष्मी चुपचाप अपने हाल पर पडे रहने को मजबूर हैं ।

शुरु शुरु में लगता है कि मार्क्सवादी चेतना को लेकर लोग वर्ग संघर्ष और सशस्त्र क्रांति के माध्यम से एक नये तंत्र की स्थापना करना चाहते हैं । लेकिन बाद में धीरे धीरे स्पष्ट होने लगा कि कुछ लोगों का गिरोह भोले भाले लोगों को भडका कर उनकी आड में अपने लिए धन संपत्ति का संग्रह कर रहा है और भौतिक सुविधाओं के पीछे भाग रहा है । । लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि धनसंपत्ति के आगे य़ह लोग अनाचार के क्षेत्र में भी प्रवेश कर गये हैं और जनजातीय क्षेत्र की महिलाओं को बंदूक के बल पर शारीरिक शोषण कर रहे हैं । दुर्भाग्य से विनायक सेन, अरुंधती राय व तीस्ता सितलवाडों को अभी भी इन अनाचारियों के इस गिरोह से क्रांति के दर्शन हो रहे हैं । (समन्वय नन्द)